रविवार, 14 फ़रवरी 2010

सबसे अहम मौके पर तुम हार गये हो “विभूति”

यह महज़ उम्र का मामला नहीं होता
सवाल, सवाल होते हैं
जिसे तुम हर बार टाल जाते हो
बचकाना कहकर
तुम्हारी लड़ाईयों पर हमे यकीन है
हमे यकीन है कि हम बचे हैं
हमारे बच्चे मस्जिद में अब भी
नमाज़ अदा करने जाते हैं
थोड़ा डर सहम के साथ
वे गुजरात में भी रह ही लेते हैं

हमारे जिंदा होने का सुबूत हैं
वे लड़ाईयाँ
जो लड़ी गयी
जिसमे तुम भी शामिल थे

सुना था कि
शहर और कर्फ्यू एक साथ नहीं रहे वहाँ
जहाँ तुम मौजूद थे
आये भी तो किताबों में छिपकर
तुम्हारे तबादले के बाद
सुना है कि
तबादला, शहर, कर्फ्यू, और चोर हैं
तुम भी वहीं कहीं
उम्र की बढ़त और साहस की कमी के साथ
सुनाने वाले ने कहा था
“मैं झूठ नहीं बोलता”
यह बोलकर
कोई कितना भी झूठ बोले
कोई कैसे टोकेगा

क्या किताबें अब सिरहाने की तकिया हो गयी हैं “विभूति नारायण”
जिसका इश्तेमाल वही करते हैं
जो सोने की तैयारी में हैं
अपनी कमसिन उम्र में मैने चाहा था
और मैं खुश हूँ कि
मेरी चाहत अब भी बची हुई है
कि किताबें जूता बन जायें
चलने के पहले हर आदमी के पैर कसने का
आदमी के बदलने से
आदमीयत से भरोसा अभी भी नहीं उठा “विभूति नारायण”
कई लोगों के जीने की वज़ह बहुत मामूली होती है
जबकि मामूली जीजें कई पीढ़ीयों तक हल नहीं होती

तुमने किताब को किताब कहा
जिसे पढ़ा जाना चाहिये
सिद्धान्त को सिद्धान्त कहा
जिसे गढ़ा जाना चाहिये
और लगा दिये हैं कई लोहार और बढ़ई
जिन्हें चस्मा और कुदाल में फर्क करना नहीं आता
पर तुम तो बखूबी जानते हो
अगर चस्मे को तुम कुल्हाड़ी कहोगे
तो कितने सारे कहेंगे कुल्हाड़ी
और यह भी जानते हो
कि वे क्यों कह रहे हैं
चस्मे को कुल्हाड़ी
जबकि तुम, वे, हम, सब
जानते हैं कि चस्मा, चस्मा होता है कुल्हाड़ी होती है कुल्हाड़ी


एक झूठी लड़ाई कितनी आसान होती है
तब जब लोग उलझ गये हों झूठ में,
और झूठ, झूठ कहाँ रहता है
जबतक कोई उंगली उठाकर यह न कहे “यह रहा झूठ”
जबकि तुम सोचो
सच में सोचो, सच के बारे में
उस सच के बारे में, जिसे तुम खुद से कह सको
कि सच यह था
तुम तलासो ईमानदारी, आदमी के इर्द-गिर्द बची रह जाती है
उम्र से ईमानदारी का कोई सीधा नाता नहीं
तुम्हें भी मिल ही जायेगी
तुम्हारे कुर्ते के जेब में
या बटन के धागे में
कम ही सही

वह जो बचा था तुम्हारे लिये
वे लड़ाईयां जिन्हें तुमने जीता है
किन्हीं मोर्चों पर
और जिनके खिलाफ तुम लड़े
आज तुम्हारे साथ खड़े हैं

शायद सबसे अहम मौके पर तुम हार गये हो “विभूति नारायण”.
विश्वविद्यालय के एक छात्र द्वारा भेजी गयी.

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