गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

विभूति जी सुनिये अनिल चमड़िया सराब पीते हैं, गलत करते हैं न

यह छूठ जब कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा फैलाया गया तो अनिल चमड़िया ने एक लेख लिखा था जो कई अखबारों में छपा था इसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है- वैसे यहाँ यह मसला नहीं था कि सराब पीने पर बात की जाती पर इससे यह पता जरूर लगाया जा सकता है कि अनिल चमड़िया को किस-किस रूप में इस विश्वविद्यालय में प्रताड़ित होना पड़ा है और अन्य ऐसे कितने अध्यापक हैं जो प्रताड़ित हो रहे हैं पर जुबान नहीं खोल पा रहे हैं।

सत्ता का क्रूर प्रचार तन्त्र /अनिल चमड़िया
अगर आप बिना दूध की चाय पीते हों और उसे शीशे के गिलास में पीते हो तो आपको आसानी से शराबी कहा जा सकता है. दिन में कई बार ऐसी चाय पीते हों और कई लोगों के साथ पीते हो तो आपके घर को शराबियों के अड्डे के रूप में प्रचारित किया जा सकता है. हमारे समाज में प्रचार का गहरा असर है. प्रचार का एक ढाँचा है जिस पर समाज में वर्चस्व रखने वालों का नियंत्रण हैं. बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब गणेश की मूर्तियों के दूध पीने के करिश्मे को वास्तविकता के रूप में दुनिया के बड़े हिस्से में कई घंटों में स्थापित कर दिया गया था. यह काम किसी मीडिया के प्रचार के जरिये नहीं हुआ था. मीडिया के मंच प्रचार के माध्यम तो हैं लेकिन हर तरह के प्रचार मीडिया द्वारा ही स्थापित नहीं होते हैं. जैसे किसी भी छोटे बड़े संस्थान में किसी के बारे में किसी तरह के प्रचार को जब स्थापित किया जाता है तो उसमें किस माध्यम की भूमिका होती है?दरअसल प्रचार अनिवार्य तौर पर किसी राजनीति से जुड़ा होता है. इसमें सच को देखना बेहद मुश्किल काम होता है.अमेरिका ने इराक के राष्ट्रपति शहीद सद्दाम के खिलाफ लंबे समय तक अभियान चलाया. अमेरिका ने कहा कि इराक के पास जनसंहारक रासायनिक हथियार हैं और उससे पूरी दुनिया में तबाही लाई जा सकती है. यह अभियान लगातार चलता रहा और जब से ये अभियान शुरू हुआ तब से उसे सच मानने वालों की संख्या तब तक बढ़ती रही जबतक कि अमेरिका ने सबसे पुरानी सभ्यताओं के बीच विकसित देश इराक को तबाह नहीं कर दिया. बाद में यह पता चला कि इराक के पास ऐसे हथियार नहीं थे . इस प्रचार का मकसद केवल सद्दाम हुसैन को खत्म करना था और सीना तानकर खड़े होने वाले इराक जैसे देश को झुकना सिखाना था. बाद में दुनिया भर की जनवादी ताकतें हाथ मलती रहीं लेकिन उससे क्या होता है.प्रचार के ढांचे को समझने के लिए एक चीज जरूरी होती है कि किसी भी तरह के प्रचार को किस तरह से खड़ा किया जा सकता है. एक उदाहरण के जरिये इसे समझा जा सकता है. यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज करने वाली एक संस्था की समिति के एक सदस्य ने एक दिन कई लोगों के बीच खड़े होकर संस्था की अध्यक्ष से कहा कि वो उन्हें अकेले में यौन उत्पीड़न की एक शिकायत पर की गई जांच की रिपोर्ट को नहीं दिखा सकता है. अध्यक्ष जांच समिति के उस सदस्य को भौचक देखती रही. उसे आश्चर्य हुआ कि समिति का सदस्य उसे ऐसा क्यों कह रहा है जबकि उन्होंने तो कभी भी उस सदस्य से उस रिपोर्ट को दिखाने के लिए नहीं कहा. अकेले या दुकेले की बात ही कहाँ से उठती है. दरअसल समिति का सदस्य जिसके खिलाफ शिकायत थी उसके प्रति सहानुभूति रखता था. वह दो बातों को ध्यान में रखकर अपने प्रचार की सामग्री को बड़े दायरे में भेजना चाहता था. पहली बात तो वह तकनीकी रूप से गलत नहीं बोल रहा है इसके प्रति सावधनी बरत रहा था. दूसरे वह यह संदेश भेजना चाहता था कि संस्था की अध्यक्ष इस मामले में कुछ खास व्यक्तिगत दिलचस्पी ले रही है. जिन लोगों ने समिति के सदस्य से संस्था की अध्यक्ष से यह कहते सुना उन्होंने तत्काल ही दूसरे लोगों से कहना ये शुरू कर दिया कि संस्था की अध्यक्ष जाँच समिति की रिपोर्ट को अकेले देखना चाहती थी. इस तरह से एक प्रचार अभियान की शुरुआत होती है . जाहिर सी बात है कि जो इस तरह का प्रचार अभियान विकसित करना चाहता है वह इस बात को लेकर अपनी पक्की अवधरणा बनाए हुए है कि समाज में प्रचार का जो ढाँचा विकसित है यह सामग्री उसकी खुराक के रूप में इस्तेमाल हो जाएगी. लेकिन अध्यक्ष इस तरह के प्रचार की बारीकियों को नहीं समझती थी और केवल अपने आदर्श और नैतिकता के तहत जाँच को एक अंजाम तक पहुँचते देखना चाहती थी. इस तरह के प्रचार बड़े स्तर पर किस तरह से विकसित किए जाते हैं इसे संसद की रिपोर्टिंग के दौरान भी इस लेखक ने अनुभव किया. संसद में अक्सर सवाल उठाए जाते हैं कि फलां समाचार पत्रा में इस आशय के समाचार प्रकाशित हुए हैं. सरकार को इस पर जवाब देना चाहिए. दूसरी तरफ स्थिति यह है कि समाचार पत्रा यदि किसी भी तरह के समाचार को प्रकाशित करता है तो वह गलत भी हो सकता है और बेबुनियाद भी हो सकता है. लेकिन वह इसके लिए किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. उसे जवाबदेह होना चाहिए ये एक अपेक्षा है और ये एक दूसरी बात है.अब अखबार में छपने के बाद संसद का सदस्य उसे अपना आधर बना लेता है. प्रचार का आधर किस तरह से विकसित किया जा रहा है इसे समझना जरूरी होता है. फिर संसद में पूछे गए सवाल पर अखबार ये समाचार बना सकता है कि संसद में ये सवाल पूछा गया. संसद में सवाल के पहुंचने के बाद प्रचार को विश्वसनीयता का भी एक आधर मिल जाता है. संसद के प्रति समाज का एक भरोसा है. इस तरह बार बार उलटपफेर से एक प्रचार अभियान विकसित होता है. समाज और सत्ता पर वर्चस्व रखने वाले लोग इसी तरह से प्रचार के ढाँचे का इस्तेमाल करते हैं. माध्यमों से वे अपने प्रचार की गति को तेज करते हैं. मीडिया ने इस काम में बहुत मदद की है.समाज में खबरें सुनना, पढ़ने और देखने की आदत का विकसित होना ही महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि उसमें किसी भी उस तक पहुँचने वाली सामग्री के भीतर देख पाने की क्षमता का विकास भी जरूरी होता है. वह किसी भी सामग्री का विश्लेषण करने की क्षमता का विकास नहीं करेगा तो वह हर वक्त शासकों के प्रचार अभियान का शिकार होगा. काली चाय शराब के रूप में उसे दिखाई जाएगी वह उसे मानने के लिए अभिशप्त होगा. मीडिया के विस्तार और उसके बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर तो समाज से और भी गहरी दृष्टि विकसित करने की अपेक्षा की जाती है.

प्रो. अनिल चमड़िया को हटाये जाने की निंदा- अम्बेडकर स्टूडेंट फोरम

वर्धा: ०३-०२-१०
आज दिनांक ३/२/१० को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में अम्बेडकर स्टूडेन्ट फोरम की केन्द्रीय कार्यकारिणी की एक बैठक हुई इसमे विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दलितविरोधी कार्यवाहियों के खिलाफ आंदोलन को और तेज करने की रूपरेखा पर विचार किया गया फोरम की तरफ से एक निंदा प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसमे जनसंचार विभाग के प्रोफेसर अनिल चमड़िया को कुलपति द्वारा हटाये जाने की घोर भर्त्सना की गयी. निंदा प्रस्ताव में यह कहा गया कि प्रो. अनिल चमड़िया देश के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी और पत्रकार हैं. वे लगातार दलित, शोषित और वंचित तबकों के लिये लिखते रहे हैंऔर आंदोलनो में हिस्सा भी लेते रहे हैं. हमेशा न्याय और सच का पक्ष लेने वाले प्रो. चमड़िया वि.वि. में बेहद लोकप्रिय प्राध्यापक रहे हैं और छात्रों के अकादमिक विकास के लिये हमेशा तत्पर और सक्रिय रहे हैं. सामंती और जातिवादी कुलपति विभूति नरायण राय को यही रास नहीं आया और उन्होंने प्रो. चमड़िया को साजिश के तहत वि.वि. से हटा दिया.
फोरम ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अम्बेडकर की भूमि वर्धा में दलित विरोधी किसी भी कदम को हम और बर्दास्त नहीं करेंगे. कार्यकारिणी ने प्रो. चमड़िया के प्रति वि.वि. प्रशासन के इस जातिवादी और शाजिसाना कदम के खिलाफ आंदोलन तेज करने का निर्णय लिया है. आज से एक हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है जिसे राष्ट्रपति, मानव संसाधन विकास मंत्री और यू.जी.सी. को भेजा जायेगा. फोरम ने वि.वि. के सभी छात्रों से यह अपील की है कि वे विश्वविद्यालय के छात्र विरोधी, सामंती नजरिये के खिलाफ एक जुट हों और वि.वि. के प्रत्येक कार्यक्रम का तब-तक वहिस्कार करें जब तक एक लोकतांत्रिक स्थिति कायम नहीं की जाती. गौरतलब है कि पिछले दिनों आयोजित “कथा-समय” का भी फोरम के सदस्यों ने पूरी तरह वहिस्कार किया. इन स्थितियों के बने रहने तक विश्वविद्यालय के दलित छात्र वि.वि. में भविष्य में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों का भी वहिस्कार जारी रखेंगे. फोरम ने चेतावनी दी कि यदि प्रो. अनिल चमड़िया को वि.वि. में वापस नहीं लाया गया तो यहाँ का दलित छात्र समुदाय चुप नहीं बैठेगा और आन्दोलन को व्यापक स्तर पर छेड़ा जायेगा.
केन्द्रीय सदस्य
अम्बेडकर स्टूडेन्ट फोरम
म.गा.अ.हि.वि.वि., वर्धा

वर्धा मेल से प्राप्त

शनिवार, 30 जनवरी 2010

एक अपील छात्रों, पत्रकारों और देश के भद्रजनों से

विस्फोट फार मीडिया पर दरोगा साब ने एक साक्षात्कार में कहा- कहने दीजिये कहने से क्या होता है, यह जो कुछ उनके बारे में छप रहा था उसकी प्रतिक्रिया के तौर पर था. अगर कहने दीजिये कहने से कुछ नहीं होता, बोलने दीजिये बोलने से कुछ नहीं होता, लिखने दिजीये लिखने से कुछ नहीं होता, तो हे दुनिया के लेखकों वक्ताओं यह दरोगा आपको निकम्मा समझता है, हे सुधी पत्रकारों इस दरोगा से पूछो कि क्या करें कि कुछ हो और हे साहित्य शिल्पियों तुमने अपने जीवन में परिश्रम करके जो कुछ गढ़ा है उसे यह तथाकथित पुलिस कथाकर व्यर्थ बता रहा है. क्योंकि अब तक आप लोगों ने समाज की संरचना और घटना को कहा ही तो है. तो कहने से कुछ नही होता तो क्या भूमिहार दरोगा की बात मान ली जाय और अब कहना बंद किया जाय क्योंकि बहुत कह चुके आप सब अब हमे दरोगा साब की चाहत पूरी करनी चाहिये और कहने के बजाय कुछ करना चाहिये. तो हे भद्रजनों, हे छात्रों क्या मुंतजर अल जैदी से तुम सबने कुछ नहीं सीखा. क्या दुनिया की इतनी बड़ी घटना बिना सीख के दफ़्न हो गयी. तो हम अपील करते हैं देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों, पत्रकारों, व देश के भद्र जनों से कि इसका कार्यान्वयन अब किया जाय और दरोगा जी की इच्छा पूरी हो. बुश का आना एक बार हुआ था पर इनका तो ठिकाना ही यही है हम इनके दिये बयान को झूठा न साबित होने दें.
उसी साक्षात्कार में दरोगा साब ने यह भी कहा कि मुझे पता ही नहीं था कि अनिल चमड़िया दलित हैं यह सच्चाई है सच में उन्हें नहीं पता था कि अनिल चमड़िया दलित हैं दरअसल अपनी इस व्यस्त जिंदगी में उन्हें पढ़ने लिखने का कहाँ समय मिल पाता है शाम हुई तो खान-पान चला और यह तो पूरा विश्वविद्यालय जानता है कि फिर रात जल्दी ही सो जाते है सर, ऐसा अमित विश्वास का कहना है अब भला वो झूठ कैसे बोल सकता है शायद इसीलिये एक मात्र नेक छात्र मिथिलेश तिवारी के बाद अमित विश्वास हैं. तो इन्हें कैसे पता चलता कि अनिल चमड़िया दलित हैं ये तो भूमिहार या सवर्ण समझ के नियुक्ति ही किये थे और जब पता चला तो भूल सुधार ली है अब इंसान हैं गलती तो इंसान ही करता है.
कथा समय में छात्र-छात्राओं ने अघोषित बहिस्कार किया २४७ छात्रों में ३०-३५ की ही उपस्थिति रही. पर पहले दिन उपस्थित छात्रों, जिनमे मैं भी सम्मलित हूँ क्या आपने ध्यान से इनका वक्तव्य नहीं सुना ये नये कथाकारों में कोई आंदोलन खड़ा करने की ताकत नहीं देखते भला सोचिये कि जब तक साहित्य में दरोगा मौजूद है किसी की क्या मजाल कि लिखे और जो क्लासिक इन्होंने रचा है वह सब तो आपने पढ़ा ही होगा. पिछले बरस दरोगा जी की नियुक्ति जब हिन्दी वि.वि. के थाने में हुई या कहें जब इनका तबादला हुआ शायद तबादला शब्द उन्हें भी प्रिय लगे तो विश्वविद्यालय में लोकतंत्र लाने की बात कर रहे थे पर लोकतंत्र ऐसी चीज है जो बड़े संघर्ष से मिलती है इस समय महगायी इतनी बढ़ गयी है और लोकतंत्र इतना कम हो गया है कि पूरे देश में लोकतंत्र के लाले पड़े हैं सो जितना भी लोकतंत्र मिला अकेले रख लिये जो बचा सो रिश्तेदारों को दे दिया उसके बाद जाति बिरादरी को अब बचा नहीं तो छात्रों को खाक लोकतंत्र देते सो या तो इनसे लोकतंत्र छीन लिया जाय या फिर इसी तानाशाही में जिया जाय पर इसमे भी दिक्कत है कि हर वक्त ये खुद भी लोकतंत्र लेकर नहीं चलते, उन्हें इसके छीने जाने का भय है तो कभी राकेश श्रीवास्तव तो कभी नदीम हसनैन, कभी अनिल राय अंकित को दिये रहते हैं. तो सबसे बड़ी समस्या है लोकतंत्र को पाने की दोस्तों, यह एक सब्र का काम है. अभी दलित अध्यापक कारुन्यकरा और सुनील कुमार व कुछ अन्य छात्रों का इनकाउंटर होना बाकी है. आप इंतजार करें.
तो देश के भूमिहारों एक हो, तुम मुझे घूस दो मैं तुम्हें नौकरी दूंगा, दलितों विश्वविद्यालय छोड़ो, छात्राओं अपने कमरे में कैद रहो, यह विश्वविद्यालय तब-तक तरक्की नहीं कर सकता जब तक चोरों की जमात विश्वविद्यालय पर काबिज नहीं हो जाती. शायद यही वे परिवर्धित नारे हैं जो दरोगा साब के मन-मस्तिस्क में गूंजते हैं जिससे वे लोकतंत्र बहाल करना चाहते हैं.

सनातन सिस्टम में भी फैसला करने का अधिकार पण्डितों व भूमिहारों के हाथ में था- विजय प्रताप

विजय प्रताप राजस्थान पत्रिका के पत्रकार हैं.
अनिल चमड़िया एक 'इडियट' टीचर है। ऐसे 'इडियट्स' को हम केवल फिल्मों में पसंद करते हैं। असल जिंदगी में ऐसे 'इडियट' की कोई जगह नहीं। अभी जल्द ही हम लोगों ने 'थ्री इडियट' देखी है। उसमें एक छात्र सिस्टम के बने बनाए खांचे के खिलाफ जाते हुए नई राह बनाने की सलाह देता है। यहां एक अनिल चमड़िया है, वह भी गुरू शिष्य परम्परा की धज्जियां उड़ाते हुए बच्चों से हाथ मिलाता है, उनके साथ एक थाली में खाता है। उन्हें पैर छूने से मना करता है। कुल मिलाकर वह हमारी सनातन परम्परा की वाट लगा रहा है। महात्मा गांधी के नाम पर बने एक विष्वविद्यालय में यह प्रोफेसर एक संक्रमण की तरह अछूत रोग फैला रहा है। बच्चों को सनातन परम्परा या कहें कि सिस्टम के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। दोस्तों, यह सबकुछ फिल्मों में होता तो हम एक हद तक स्वीकार्य भी कर लेते। कुछ नहीं तो कला फिल्म के नाम पर अंतरराश्ट्ीय समारोहों में दिखाकर कुछ पुरस्कार-वुरस्कार भी बटोर लाते। लेकिन साहब, ऐसी फिल्में हमारी असल जिंदगी में ही उतर आए यह हमे कत्तई बर्दाश्त नहीं। 'थ्री इडियट' फिल्म का हीरो एक वर्जित क्षेत्र (लद्दाख) से आता था। असल जिंदगी में यह 'इडियट' चमड़िया (दलित) भी उसी का प्रतिनिधित्व कर रहा है। ऐसे तो कुछ हद तक 'थ्री इडियट' ठीक थी। हीरो कोई सत्ता के खिलाफ चलने की बात नहीं करता। चुपचाप एक बड़ा वैज्ञानिक बनकर लद्दाख में स्कूल खोल लेता है। लेकिन यहां तो यह 'इडियट' सत्ता के खिलाफ भी लड़कों को भड़काता रहता है। हम शुतुमुर्ग प्रवृत्ति के लोग सत्ता व सनातन सिस्टम के खिलाफ ऐसी बाते नहीं सुन सकते।सो, साथियों हमारे ही बीच से महात्मा गांधी अंतरराश्ट्ीय हिंदी विष्वविद्यालय के कुलपति या यूं कहें कि सनातन गुरुकुल परम्परा के रक्षकद्रोणाचार्य के अवतार वी एन राय साहब ने इस परम्परा की रक्षा का बोझ उठा लिया है। वह अपनी एक पुरानी गलती (जिसमें कि उन्होंने छात्रों के बहकावे में आकर चमड़िया को प्रोफेसर नियुक्त करने की भूल की) सुधारना चाहते हैं। राय साहब को अब पता चल गया है कि गलती से एक कोई एकलव्य भी उनके गुरुकुल में प्रवेश पा चुका है। दुर्भाग्यवश अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं (नहीं तो कोई अंगुली काटने जैसा ऐपीसोड करते) इसलिए चमड़िया को बाहर निकालने के लिए थोड़ा मुष्किल हो रहा है। तब एकलव्य के अंगुली काटने पर भी इतनी चिल्ल-पौं नहीं मची थी जितने इस कथित लोकतंत्र में कुछ असामाजिक तत्व कर रहे हैं। राय साहब आपके साथ हमें भी दुख है कि इस सनातन सिस्टम में लोकतंत्र के नाम पर ऐसे चिल्ल-पौं करने वालों की एक बड़ी फौज तैयार हो रही है। आपने ‘साधु की जाति नहीं पूछने वाली’ मृणाल पाण्डे जी के साथ अपने ऐसे इडियटों को सिस्टम से बाहर करने का जो फैसला किया है, वो अभूतपूर्व है। इसी इडियट ने हमारी मुख्यधारा की मीडिया के सामने आइना रख दिया था, जिसकी वजह से हमें कुछ दिनों तक आइनों से भी घृणा होने लगी थी। हम आइनें में खुद से ही नजर नहीं मिला पा रहे थे। वो तो धन्य हो मृणाल जी का जिन्होंने "साधु को आइना नहीं दिखाना चाहिए उससे केवल ज्ञान लेना चाहिए" का पाठ पढाया.
ठीक ही किया जो अपने विष्णु नागर जैसे छोटे कद के आदमी को मृणाल जी व खुद के समकक्ष बैठाने की बजाए उनका इस्तीफा ले लिया। हमारे सनातन सिस्टम में सभी के बैठने की जगह तय है। उसे उसके कद के हिसाब से बैठाना चाहिए। मृणाल जी की बात अलग है। वो कोई चमाइन नहीं, पण्डिताइन हैं, उनका स्थान उंचा है। सनातन सिस्टम में भी फैसला करने का अधिकार पण्डितों व भूमिहारों के हाथ में था, आप उसे जिवित किए हुए हैं हिंदू सनातन धर्म को आप पर नाज है।साहब आप तो पुलिस में भी रहे हैं। हम जानते हैं कि आपको सब हथकंडे आते हैं। एक और दलितवादी जिसका नाम दिलीप मंडल है आप की कार्यषैली पर सवाल उठा रहा है। कहता है कि आपने एक्जिक्यूटिव कांउसिल से चमड़िया को हटाने के लिए सहमति नहीं ली। उस मूर्ख को यह पता ही नहीं की द्रोणाचार्य जी को एकलव्य की अंगुली काटने के लिए किसी एक्जिक्यूटिव कांउसिल की बैठक नहीं बुलानी पड़ी थी। आप तो फैसला "आन द स्पाट" में विश्वाश करते हैं। सर जी, यह तो लोकतंत्र के चोंचले हैं। और आप तो पुलिस के आदमी हैं, वहां तो थानेदार जी ने जो कह दिया वही कानून और वही लोकतंत्र है। लोग कह रहे हैं, साहब कि जिस मिटिंग में चमड़िया को हटाने का फैसला हुआ उसमें बहुत कम लोग थे। उन्हें क्या पता कि जो आये थे वह भी इसी शर्त पर आए थे कि सनातन सिस्टम को बचाए रखने के लिए सभी राय साहब को सेनापति मानकर उनका साथ देंगे। जो खिलाफ जाते आप ने बड़ी चालकी से उन्हें अलग रख दिया। वाह जी साहब, इसी को कहते हैं सवर्ण बुद्धि। आप वहां हैं तो हमें पूरा भरोसा है कि वह विष्वविद्यालय सुरक्षित (और ऐसे भी साहब जहां पुलिस होगी वहां सुरक्षा तो होगी ही) हाथों में है। साब जी, हमने गांव के छोरों से कह दिया है - यह लंठई-वंठई छोड़ों। इधर-उधर से टीप-टाप कर बीए, ईमे कर लो। बीयेचू चले जाओ, कोई पंडित जी पकड़ कर दुई चार किताबे टीप दो। फिर तो आप हईये हैं। एचओडी नहीं तो कम से कम प्रुफेसर-व्रुफेसर तो बनवाईये दीजिएगा। और साहब हम आपके पूरा भरोसा दिलाते हैं यह लौंडे 'अनिल चमड़िया' जैसा इडियट नहीं 'अनिल अंकित राय' जैसा चतुर बनकर आपका नाम रौशन करेंगे।
नई पीढ़ी ब्लाग से साभार

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

एक सही नियुक्ति को भी खा गये विभूति नरायन राय- युवा कथाकार चन्दन पान्डेय


परसों रात साढ़े ग्यारह बजे हिसार के होटल में चेक-इन कर रहा था जब चन्द्रिका का फोन आया। उसके मार्फत यह खबर मिली कि अनिल चमड़िया को महात्मा गान्धी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। इस कुकर्म को चाहे जो नाम दिया जाये, इसके पक्ष में जो तर्क रखे जायें, मैं यही समझ पाया कि अनिल चमड़िया की नौकरी छीन ली गई। कुछ बड़े नामों की एक मीटिंग बुलाई गई और कुछ नियमों का आड़ ले सब के सब उनकी नौकरी खा गये।

हमारे समाज से विरोध का स्वर तो गायब हो ही रहा है, विरोध में उठने वाली आवाजों के समर्थक भी कम हो रहे हैं। यह सरासर गलत हुआ। मेरे पास एक तल्ख उदाहरण है। बचपन की बात है, गाँव में जब हम नंग-धड़ंग बच्चों के बीच कोई साफ सुथरा कपड़ा पहन कर आ जाता था, विशेष कर चरवाही में, तो बड़ी उम्र के लड़के उन बच्चों का मजाक उड़ाते थे और कभी कभी पीट भी देते थे। किसी ना किसी बहाने से,उन बच्चों को जानबूझकर मिट्टी में लथेड़ देते थे। आप समझ गये होंगे मैं कहना क्या चाहता हूँ?
वजहें जो भी हों सच यह है कि अनिल चमड़िया के विशद पत्रकारिता अनुभव से सीखने समझने के लिये विश्वविद्यालय तैयार नही था। वरना जिस कुलपति ने नियुक्ति की, उसी कुलपति को छ: महीने में ऐसा क्या बोध हुआ कि अपने द्वारा की गई एक मात्र सही नियुक्ति को खा गया।(मैं चाहता हूँ कि पिछली पंक्ति मेरे मित्रों को बुरी लगे)। मृणाल पाण्डेय, कृष्ण कुमार, गोकर्ण शर्मा, गंगा प्रसाद विमल और ‘कुछ’ राय साहबों ने अनिल की नियुक्ति का विरोध किया तो इसका निष्कर्ष यही निकलेगा कि पत्रकारिता जगत की उनकी समझ कितनी थोथी है? यह समय की विडम्बना है कि पत्रकारिता जगत में सिर्फ और सिर्फ सम्बन्धो का बोलबाला रह गया है। कितने पत्रकार मित्र ऐसे हैं जो नींद में भी किसी पहुंच वाली हस्ती से बात करते हुए पाये जाते हैं।

आश्चर्य इसका कि कई लोग यह कहते हुए पाये गये: अनिल को विश्वविद्यालय के विपक्ष में बोलने की क्या जरूरत थी। इन गये गुजरे लोगों को यह समझाने की सारी कोशिशे व्यर्थ हैं कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज उठाना कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसकी सजा में किसी की नौकरी छिन जाये। वर्धा में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जिसके खिलाफ सख्त आवाज उठनी चाहिये।

ये हर कोई जानता है कि पात्रता के बजाय सम्बन्धों और ताकत के सहारे चल रही इस दुनिया में विभूति नारायण राय को कोई दोषी नहीं ठहरायेगा। जिस एक्ज्यूटिव काउंसिल के लोगों ने इस धत-कर्म में कुलपति का साथ दिया है उन्हे भी उनका हिस्सा दिया जायेगा। वैसे भी 1995 से अखबार देखता पढ़ता रहा हूँ पर आज तक मृणाल का कोई ऐसा आलेख या कोई ऐसी रिपोर्टिंग नही देखी जिससे लगता हो कि ये पत्रकार हैं या कभी रही हैं। हाँ उदय प्रकाश की एक कहानी में किसी मृणाल का जिक्र आता है जो दिनमान या सारिका में “अचार कैसे डाले” जैसे लेख लिखती है। कुल बात यह कि मृणाल या दूसरे ऐसी पात्रता नही रखते कि वो किसी की नौकरी खा जाये।

अनिल जी, हम लोग कथादेश में तथा अन्य जगहों पर आपके लेख पढ़ते हुए बड़े हुए हैं। आपसे बहुत कुछ सीखा है। आप एक दफा भी यह बात अपने मन में ना लाना कि आपसे कोई चूक हो गई। आप इस तुगलकी फरमान के खिलाफ लड़ाई जारी रखिये। अपने सीमित संसाधनों के बावजूद आप इस लड़ाई में चापलूसों की फौज के सारे तर्क ध्वस्त कर देंगे और ताकतवर जुगाड़ियों को परास्त करेंगे, इस बात का भरोसा है।
चन्द्रिका.मीडिया मेल से प्राप्त

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

कथाकारों, सामंतवाद के गढ़ में आपका स्वागत है.

प्रो. असगर वजहात, संजीव, चित्रा मुदगल, वीरेन्द्र यादव, अब्दुल बिस्मिल्लाह, गंगाप्रसाद विमल, हरि भटनागर, अजय नावरिया, भगवान दास मोरवाल, एस.आर. हरनोट, वंदना राग, महुआ माझी, राजेन्द्र राजन, गीत चतुर्वेदी, मनोज रूपड़ा, पंकज मित्र, मो. आरिफ, तेजेन्द्र शर्मा, मृदुला शुक्ला, वीरेन्द्र मोहन, मीनाक्षी जोशी, बसंत त्रिपाठी, प्रमोद कुमार तिवारी, सूरज प्रकाश, अजीत राय, आशा पाण्डेय, विरेन्द्र मोहन, से.रा. यात्री, आप सब को हिन्दी विश्वविद्यालय के कथा समय में आमंत्रित किया गया है. हिन्दी कथा साहित्य की दो दशकों कॊ यात्रा में यदि सबसे अच्छे कथाकार और उपन्यासकार विभूतिनरायण राय हैं तो, तो बेरोजगारी की स्थिति में यह एक पंक्ति किसी भी बेरोजगार आगंतुक को रोजगार दे सकती है और यहाँ वैकेंसी नहीं निकलती, आदमी निकल आया काम का, तो बैकेंसी बन जाती है. तो हे भद्रजनों, कथाकारों हम आपका स्वागत करते हैं कि “जिन पंचटीला नईं देख्या ओ न भया कथाकार”.
पिछले दिनों हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रशासन द्वारा की जा रही तानाशाही और सवर्णवादी रूप आपको अखबारों और ब्लागों के माध्यम से शायद पता चला ही हो जिस पर विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने लिखा था. विभूतिनरायण राय ने शायद उन छात्रों को बुलाकर बात-चीत करने का प्रयास भी किया था, महोदय यहाँ छात्रों को दलाल बनाने की यही प्रक्रिया है. खैर, यह कथा का समय है अक्सर कई पाप करने के बाद ब्रहमणों की व सवर्णों की यह आदत होती है कि वे कथा सुन लेते हैं और पाप से मुक्त हो जाते हैं. राय साब यानि दरोगा जी ने अपने थाने में कथा रखी है और आप जैसे पंडितों को आमन्त्रित किया है ताकि उन्हें कई कुकर्मो के बाद एक सुकर्म करके थोड़ा मुक्ति का एहसास हो. इस तरह की कथा वे अक्सर विश्वविद्यालय में करवाते रहते हैं जिनके विषय से आपको लगेगा कि क्रांति अब हुई की तब और कई बार माईक पर क्रांति करते भी हैं अक्सर छद्म प्रगतिशील यही करते हैं. यह उनका पी.आर.ओ. प्रोग्राम है जिसमे वे साहित्यिक बुद्धिजीवियों के बीच अपनी साख मजबूत करते हैं. तो भद्रजनों सामंतवाद के गढ़ में हम आपका स्वागत करते हैं. आप सब कहानी के कुछ बीज तलासियेगा आपको उगे उगाये पौधे मिल जायेंगे, कहानी के पेड़ मिल जायेंगे, उपन्यासों के लहलहाते खेत मिल जायेंगे. इस पथरीली जमीन में कथा की उर्बरा शक्ति बहुत है, उनके तकले सिरों को झांकियेगा जिनके सिर में अब बाल नहीं बचे हैं बची है तो बस चमकती हुई खोपड़ी पर वहीं कहीं चमकती खोपड़ियों में होगा आपका पात्र. जो दिल तो बच्चा है थोड़ा कच्चा है अभी भी गाता रहता है. यहीं पर आपको मिलेंगे प्रख्यात चोर गुरू अनिल राय अंकित, पर अब ये टाई नहीं लगाते इसलिये गुमराह मत होइयेगा और ये चोर जैसे नहीं मीडिया विभाग के हेड जैसे दिखते हैं. अगर हो सके तो इन्हें बधाई दे दीजियेगा क्योंकि आभी हाल में ही इनकी नियुक्ति को इ.सी. द्वारा मान्य करवाया जा चुका है अब इनकी चोरी ही इनकी दादागीर बन गयी है कारण कि अनिल अंकित “राय” और विभूतिनरायण “राय” आप समझ गये होंगे, ये जाति बड़ी इफेक्टिब चीज होती है और अगर रिश्तेदारी भी हो तो क्या कहने. यहाँ भी कुछ ऐसा ही मामला है साब.
दरोगा साब हर रोज इनकाउंटर के मूड में रहते हैं कभी किसी दलित छात्र का तो कभी किसी अध्यापक का आप आयेंगे तो पता चलेगा कि हाल में कौन-कौन शिकार हुआ है. इस इनकाउंटर को कहानी की भाषा में समझिये यह इलाहाबाद वाला इनकाऊंटर नहीं है. दलित अध्यापक कारुन्यकरा को रोज एक नोटिस मिलती है उनसे आप मिलियेगा तो पूछियेगा कि ब्रह्मणवाद मुर्दावाद गाली किसके लिये है. विश्वविद्यालय का हर अध्यापक इस तानाशाही पर अंदर-अंदर सुगबुगाता है पर पेट का सवाल है सो दरोगा साब से कुछ नहीं बोलता.
और थोड़ा धीरे से कान लगाकर सुनिये ये जो आपका स्वागत करने के लिये पालीवाल जी हैं इन्होंने पिछले दिनों किसी महिला कर्मचारी के साथ छेड़खानी की थी और और पता चला कि नाड़ी और धड़कन पर बात करते-करते कुछ प्रेक्टिकल...............अब ज्याने दीजिये, बुजुर्ग हैं ६० साल के पर ऐसा ही कुछ कई दिनों तक विश्वविद्यालय में गूंजता रहा. आप जब इनसे हाथ मिलाइये तो जरा बच के रहिये और आप किस कमरे में ठहरे हैं यह कतई मत बताईयेगा, सोते समय कुंडी बंद कर लीजियेगा और जब भी मिलियेगा दो-चार लोगों के साथ बस...हां ये इस बात से दुखी हैं कि स्नोवाबार्नों क्यों नहीं आ रही हैं. विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश जी बहुत नेक इंसान हैं अक्सर थानेदार साब को काबू में कर लेते हैं. एक दिन एक लड़्की को क्लास में बुलाकर बोले कि ये लड़की बिकनी पहने तो कैसी लगेगी यह आपको अटपटा लगा होगा पर महिलाओं के बारे में यहाँ की छात्राओं के बारे में आला अधिकारियों के विचार ऐसे ही हैं. प्राक्टर मनोज कुमार के किस्से किसी दिन इत्मिनान से बताऊंगा पर नये साल पर इन्होंने छात्र-छात्राओं को तोहफा दिया और पुरुष छात्रावास में छात्राओं के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया. शायद किसी छात्रा ने किसी छात्र को फटकारा था और सभी छात्राऒ पर प्रतिबंध। प्रतिबंधित करने का आदेश सामंत के मुंसी राय साब ने दिया. बाकी कहानिया आप यहाँ आ के ढूंढ़ियेगा. हमने अपने कैमरे से १३ जनवरी की शाम को कुछ दिलचस्प फोटो खींचे हैं जो आपको मुफ्त मिल जायेंगे और आप इन चेहरों को पहचानियेगा जबकि वे आपके इर्द गिर्द ही रहेंगे. हिन्दी विभाग के एक शिक्षक-शिक्षिका की कहानी.......व कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास की कई सारी काहानियां जो हर दो तीन घंटे में पुरानी हो जाती है, उपन्यास के कथानक सुबह-सुबह झाड़ू के साथ बुहार दिये जाते हैं ये सब आपको बताउंगा और तब तक बताऊंगा जब तक ये सुधरते नहीं, जबकि मैं जानता हूँ कि ये नहीं सुधरेंगे।
वर्धा मेल से प्राप्त १३ तारीख की फोटो भी आप यहीं पर देखेंगे ऐसी मेल में सूचना थी.

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

नये साल की चुनौतीपूर्ण बधाई

साथियों,
ईक्कीसवीं सदी के पहले दशक की समाप्ति की ओर ले जाने वाला यह साल बीत रहा है और हमारा विश्‍वविद्यालय एक मध्ययुगीन काल की तरफ़ लौट रहा है। हम लौट रहे हैं, राजशाही के फ़रमानों जैसे फ़रमान के अंधेरे युग की तरफ़, हमें उन मूल्यों की तरफ़ लौटने पर विवश किया जा रहा है, जिन्हें बीती हुई पीढ़ीयों ने मनुष्‍यता के हित में कुछ सौ साल पहले छोड़ दिया था. आपके छात्रावास तक वह “सूचना”, क्षमा करें, इसे फ़तवा ही कहा जाना चाहिये?, पहुंच चुका होगा जिसमें पुरूष छात्रावास में छात्राओं का प्रवेश निषेध किया जा चुका है.
यह समय था बीते हुए साल के आंकने का, हिन्दी समाज और विश्वविद्यालय के निर्माण पर सोचने का, लेकिन यह सब कुछ नहीं हुआ…… साल बीतने के साथ जिस असमानता को कुछ और कम होना था, जिन मसलों को सुलझ जाना था, उसे एक मध्ययुगीन सामंत की मानसिकता के प्रॉक्टर द्वारा और बढ़ाये जाने का काम किया जा रहा है, जो सड़े-गले मूल्यों को थोप कर छात्र-छात्राओं पर शासन करने का प्रयास कर रहे हैं.
अगले बरस के फ़रमान शायद छात्र-छात्राओं के अलग कक्षा में अध्ययन-अध्यापन के हों, फिर शायद, अगला बरस छात्र-छात्राओं के आपस में बात-चीत पर दंड का प्रावधान लेकर आए और उसके अगले बरस विश्वविद्यालय में छात्राओं के प्रवेश पर.... निषेध! तब शायद हमें आश्‍चर्य और अफ़सोस करने तक का मौक़ा न मिले। क्या तीन वर्ष बाद आप इस विश्‍वविद्यालय को ऐसा ही देखना चाहेंगे?
हम उन छात्र-छात्राओं और विश्वविद्यालय के उन सभी सदस्यों, जो इस असमानता को कम करने की ख़्वाहिश रखते हैं, की तरफ़ से इस फ़तवे की तीखी निंदा करते हैं.
विश्वविद्यालय के आलाअधिकारियों, जेंडर असमानता को कम करने की मुहिम में लगे प्रगतिशील अध्यापक-अध्यापिका एवं छात्र-छात्राएं नये वर्ष की बधाई के साथ इस मध्य-युगीन मूल्यों के फ़तवे की चुनौती को स्वीकार करें।

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