<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807</id><updated>2011-07-28T15:15:27.242-07:00</updated><category term='तानाशाही'/><category term='प्रतिरोध'/><category term='मीडिया विभाग'/><category term='अपील'/><category term='अपनी बात'/><title type='text'>हिन्दी विश्वविद्यालय छात्र मंच</title><subtitle type='html'>महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्रों का ब्लाग.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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विवि के सलाहकार नहीं हैं अजित राय: वीसी सूत्र</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/TAOrGM-OyKI/AAAAAAAAAEQ/AHkMFY8zFkE/s1600/library"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477409694862461090" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 213px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/TAOrGM-OyKI/AAAAAAAAAEQ/AHkMFY8zFkE/s320/library%27s+photographs+001.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;अजित राय के तीसरे चीयर्स का स्‍वाद भी बिगड़ गया है। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्री हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने इस खबर से इनकार किया है कि अजित राय को उन्‍होंने सलाहकार नियुक्‍त किया है। राय के एक करीबी मित्र के हवाले से मिली खबर के मुताबिक अजित राय के कथित एसएमएस, जिसमें अजित राय ने वर्धा विवि के कुलपति के सलाहकार होने की खबर प्रसारित की थी, के बारे में जानकारी मिलने के बाद उन्‍होंने अजित राय को इसके लिए फटकार भी लगायी। जैसा कि वीएन राय के करीबी मित्र ने बताया, विश्‍वविद्यालय में ऐसा कोई पद है ही नहीं। न ही कुलपति के अधिकार में इस तरह के पद का सृजन करना है। और अगर ऐसा होता भी, तो वीएन राय के मुताबिक, उन्‍हें किसी सलाहाकार की जरूरत नहीं है। जरूरत होगी भी तो वे अजित राय जैसे अयोग्‍य लोगों को कतई इंटरटेन नहीं करेंगे।पर&lt;/span&gt; ये कुलपति नहीं बिना पड़ी के लोटा और तानाशाह है अभी हाल में जो नियुक्तिया हुई है उसमे घपला कर इसने कई नए करो को लाया है ताकि कई कर मिलकर संगठित रह सकें. आने वाली छात्रों की प्रवेश परीक्षा में भी दलितों के साथ वही होने वाला है जो काम्बले के साथ हुवा था.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-4583664513972004326?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/4583664513972004326/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4583664513972004326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4583664513972004326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='वर्धा विवि के सलाहकार नहीं हैं अजित राय: वीसी सूत्र'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/TAOrGM-OyKI/AAAAAAAAAEQ/AHkMFY8zFkE/s72-c/library%27s+photographs+001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-4238572662419547086</id><published>2010-03-08T20:32:00.000-08:00</published><updated>2010-03-08T20:40:30.897-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी बात'/><title type='text'>हिन्दी विश्वविद्यालय में तानाशाही का जिम्मेदार कौन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S5XQojsiJAI/AAAAAAAAAEI/igHJnG7nsf0/s1600-h/timthumb2.jpg"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5446488719569855490" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 106px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S5XQojsiJAI/AAAAAAAAAEI/igHJnG7nsf0/s320/timthumb2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt; हिन्दी विश्वविद्यालय में छात्रों पर हो रहा अत्याचार निरन्तर जारी है जिसका जिम्मेदार कौन है यह पूरे घटनाक्रम को समझने पर पता लगाया जा सकता है. आखिर एक बनते हुए विश्वविद्यालय में निरन्तर चल रही तानाशाही पर कौन लगाम लगायेगा.&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;मीडिया विभाग के एक छात्र अनिल को विश्वविद्यालय से निष्काशित करने के पीछे प्राक्टर मनोज कुमार और अनिल अंकित राय ने अपनी पूरी ताकत लगा दी. मनोज कुमार कथित तौर पर गाँधीवादी कार्यकर्ता रहे हैं पर इनका गाँधीवाद किस तरह का है यह इस घटना और उनकी क्रूर कार्यवाहियों से समझा जा सकता है. दिनांक १६ नवम्बर की बात है जब मीडिया विभाग में एक सेमिनार चल रहा था और अनिल नाम के एक शोधार्थी जब सेमिनार में बैठने गये तो उन्हें यह कहा गया कि वे नहीं बैठ सकते जबकि विश्वविद्यालय की परम्परा में अंतरानुसाशनिक विषयों के कारण कोई भी छात्र सेमिनार में बैठते रहे हैं. वहाँ पर बैठे छात्रों ने हस्तक्षेप कर अध्यापक अख्तर आलम से जब यह बात कही तो अनिल को सेमिनार में बैठ्ने दिया गया. जब एक छात्र द्वारा सेमिनार में कुछ गलत तथ्य प्रस्तुत किया गया तो अनिल उसे सुधारने के लिये सही तथ्य रखा इस बात पर अख्तर आलम ने उन्हें रोका और कहा कि आप बैठ सकते हैं पर कुछ बोल नहीं सकते. यह घटना है जिस आधार पर विश्वविद्यालय से एक छात्र को निष्कासित किया जाता है.&lt;br /&gt;इस निष्कासन के कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं जिससे निष्कासन के परोक्ष कारणों को भी समझा जा सकता है.&lt;br /&gt;सेमिनार के बाद अख्तर आलम से शोधार्थी अनिल ने लम्बी बात-चीत की और अख्तर आलम भी इस घटना को कोई तरजीह न देते हुए संतुष्ट दिखे. अनिल राय अंकित चोर गुरु (वर्धा) द्वारा अख्तर आलम से कहकर एक पत्र बनवाया गया जिसमे लिखा गया कि छात्र अनिल ने कक्षा को बाधित किया और इस आधार पर प्राक्टर मनोज कुमार और अनिल राय अंकित जो गहरे मित्र हैं ने मिलकर निष्कासन की एक रूपरेखा बनायी. पहले कारण बताओ नोटिस दिया गया जिसका एक जबाब शोधार्थी अनिल ने ३ पन्नों में विस्तृत रूप से तैयार करके दिया पर इस जबाब से प्राक्टर मनोज कुमार संतुष्ट नहीं हुए क्योंकि उन्हें संतुष्ट होना ही नहीं था यदि होते भी तो अनिल राय अंकित उसको असंतुष्टि में बदल देते यह जबाब कुलपति विभूति नरायण राय को प्रस्तुत किया गया और पूरे मसले पर उन्हों ने एक जाँच कमेटी बना दी. जांच कमेटी में अशोक नाथ त्रिपाठी, विश्वविद्यालय में दलित उत्पीड़न के लिये कुख्यात आत्म प्रकाश श्रीवास्तव व मनोज कुमार के विभाग के एक अध्यापक निपेन्द्र मोदी को रखा गया. इसमे किसी भी छात्र प्रतिनिधि को शामिल करना विश्वविद्यालय ने उचित नहीं समझा चूंकि सब कुछ अनिल राय अंकित और प्राक्टर द्वारा पहले से तय कर लिया गया था जिसका आगे हम विवरण प्रस्तुत करेंगे.&lt;br /&gt;कमेटी की जाँच प्रक्रिया-&lt;br /&gt;१- जाँच कमेटी ने अनिल से कोई बातचीत नहीं की न ही उनके किसी पक्ष को सुना.&lt;br /&gt;२- जाँच कमेटी ने घटना पर उपस्थित किसी भी छात्र से कोई बातचीत नहीं की.&lt;br /&gt;३- जाँच कमेटी के सदस्यों से कुछ छात्रों ने बात की जिससे पता चला कि अनिल राय अंकित और प्राक्टर मनोज कुमार के बयानों के आधार पर यह जाँच प्रक्रिया पूरी कर ली गयी.&lt;br /&gt;४- इस पूरी प्रक्रिया में महज एक हप्ते लगे पर अनिल को निष्कासित तब किया गया जब अनिल चमड़िया के मामले पर कुलपति को छात्र अनिल द्वारा एक पत्र लिखा गया और अपनी असहमति दर्ज कराने के साथ पी.एच.डी. छोड़ने की बात कही गयी. यानि घटना के ४ माह बाद दिनांक १७ फरवरी को निष्कासन की नोटिस निकाली गयी.&lt;br /&gt;इस मनमानी कार्यवाही के खिलाफ सभी छात्रों की एक आम सभा बुलायी गयी जिसमे छात्रों ने इस मनमानी कार्यवाही पर प्राक्टर का घेराव किया और उनसे कुछ सवाल पूछे जिसका जबाब प्राक्टर मनोज कुमार के पास नहीं था. मसलन प्राक्टर द्वारा किस समय सीमा तक किसी छात्र को निष्कासित किया जा सकता है यह अध्यादेश के हवाले से स्पष्ट करें? पर प्राक्टर मनोज कुमार को अध्यादेश तक नहीं पता था न ही उन्हें उनका अधिकार जब छात्रों ने विश्वविद्यालय के अधिनियम के अनुच्छेद १८, अध्यादेश १२ की धारा १० बी व धारा के बिंदु ११ को उन्हें पढ़ाया तो वे चुप हो गये. इस तरह के कई सवाल किये गये पर प्राक्टर मनोज कुमार के पास उसका कोई जबाब नहीं था और वे यह बोलते हुए कि हम इसे देखेंगे, वहाँ से चले गये. इस आधार पर छात्रों द्वारा एक हस्ताक्षर किया गया जिसमे अनिल के अन्यायपूर्ण निष्कासन को तुरंत वापस लेने की मांग की गयी पर प्राक्टर मनोज कुमार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया बल्कि निष्कासन की नोटिस कई दिनों तक अपने पास रखे. होली की छुट्टियों में जब छात्र घर चले गये तो वही अवैद्य नोटिस जो विश्वविद्यालय अधिनियम में प्राक्टर के अधिकारों के खिलाफ थी प्राक्टर द्वारा अनिल को दी गयी जिसे अनिल ने इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया कि यह गैरकानूनी है क्योंकि प्राक्टर द्वारा किसी छात्र का निष्कासन अधिकतम १५ दिनों के लिये किया जा सकता था.&lt;br /&gt;निष्कासन में न केवल विभाग बल्कि हास्टल और विश्वविद्यालय से भी निष्कासित किया गया और प्रतिदिन हास्टल में पुलिस भेजकर अनिल जिस भी छात्र के कमरे में ठहरते उन्हें परेशान किया जाता रहा. यह शहर में कर्फ्यू नहीं था बल्कि एक छात्र के लिये उस विश्वविद्यालय में कर्फ्यू लगा दिया गया जिसके कुलपति विभूति नारायण राय है. इस अन्याय पूर्ण कार्यवाही से क्या विभूति नारायण राय जी वाकिफ नहीं रहे या अभी तक नहीं हैं?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-4238572662419547086?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/4238572662419547086/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4238572662419547086'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4238572662419547086'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='हिन्दी विश्वविद्यालय में तानाशाही का जिम्मेदार कौन'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S5XQojsiJAI/AAAAAAAAAEI/igHJnG7nsf0/s72-c/timthumb2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-4305602513698285620</id><published>2010-02-15T21:52:00.000-08:00</published><updated>2010-02-15T22:03:19.803-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया विभाग'/><title type='text'>मीडिया विभाग के छात्रों द्वारा वहिस्कार</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S3oz5se-VmI/AAAAAAAAAEA/UsOqY5-KPD8/s1600-h/Boycott+Page+1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5438716566289929826" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 232px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S3oz5se-VmI/AAAAAAAAAEA/UsOqY5-KPD8/s320/Boycott+Page+1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S3oz5bA4ikI/AAAAAAAAAD4/szg-DZrWzw0/s1600-h/Boycott+Page+2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5438716561600318018" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 227px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S3oz5bA4ikI/AAAAAAAAAD4/szg-DZrWzw0/s320/Boycott+Page+2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;प्रति,&lt;br /&gt;कुलपति&lt;br /&gt;महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा&lt;br /&gt;विषय : जनसंचार विभाग के अनिश्‍िचतकालीन बहिष्‍कार की सूचना&lt;br /&gt;हमें ज्ञात हुआ है कि जनसंचार विभाग के शिक्षक प्रो अनिल चमड़‍िया को विश्‍वविद्यालय द्वारा तत्‍काल प्रभाव से सेवामुक्‍त कर दिया गया है। इस निर्णय के लिए विजिटर द्वारा नामित छह सदस्‍यीय कार्यकारी समिति की पहली बैठक के कार्यवृत्त का हवाला दिया गया है।यह कदम कुलपति विभूति नारायण राय के मनमानेपन और नियम कानून को ताक पर रख काम करने के उनके रवैये की ही एक कड़ी है। इस निर्णय से न सिर्फ विश्‍वविद्यालय, उसके अधिनियम और न्‍याय की भावना के साथ खिलवाड़ हुआ है बल्कि न्‍यायालय के निर्णय से पहले ही स्‍वघोषित, मनमाना निर्णय सुनाया है, जिससे प्राकृतिक न्‍याय के सिद्धांत का भी घोर उल्‍लंघन किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में, इक्जिक्‍यूटिव कौंसिल को मामले की आधी-अधूरी जानकारी देते हुए उसे एक कवर के रूप में इस्‍तेमाल किया गया है। वहीं, दूसरी ओर प्रोफेसर और वर्तमान में विभागाध्‍यक्ष अनिल कुमार राय अंकित के ऊपर चोरी करके कई किताबें लिखने के आरोप के बावजूद इक्जिक्‍यूटिव कौंस‍िल से उनकी नियुक्ति का कनफर्मेशन हासिल किया गया है। अनिल अंकित राय के कारनामों के बारे में देश के मीडिया में लगातार खबरें आ रही हैं। ऐसे में ये निर्णय कुलपति विभूति नारायण राय की मनमानियों का स्‍पष्‍ट प्रमाण हैं।हम छात्र-छात्राएं कुलपति के इस निरंकुश निर्णय से सर्वाधिक प्रभावित लोग हैं। अनिल चमड़‍िया न सिर्फ देश के एक जाने माने पत्रकार हैं बल्कि वे देश भर के प्रमुख पत्रकारिता संस्‍थानों में मीडिया के एक लोकप्रिय शिक्षक हैं और इसलिए हमारे विश्‍वविद्यालय द्वारा चयन की पूरी प्रक्रिया के तहत उनके आउटस्‍टैंडिंग वर्क रिकॉर्ड के आधार पर बतौर एमिनेंट स्‍कॉलर प्रोफेसर पद पर चयन किया गया था। यह बेहद अफ़सोसनाक है कि विजिटर द्वारा नामित कार्यकारी परिषद ने सभी जरूरी तथ्‍यों की जांच-पड़ताल किये बगैर कुलपति के इस मनमाने निर्णय पर मुहर लगा दी है।हम छात्र-छात्राएं इन मनमाने निर्णय के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराते हुए जनसंचार विभाग के अनिश्‍िचतकालीन बहिष्‍कार की घोषणा करते हैं। और अगर इस पर तत्‍काल उचित कार्रवाई नहीं की जाती तो विरोध स्‍वरूप अगले कदम के बतौर हम अपनी डिग्री त्‍याग देंगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छात्र छात्राएंअनिल, लक्ष्‍मण प्रसाद, दिनेश मुरार, चंद्रिका, अमिता, दिलीप, देवाशीष प्रसून, उमा साह, अतुल कुमार सिंह, आजाद अंसारी, भानु प्रताप, धीरज कांबले, उत्‍पल कांत, रोशनी, ईशा, सुनील घोड़के, राजदीप राठौर, रत्‍नाकर, नीलेश झाल्‍टे, हरि प्रताप सिंह, गुंजेश, रेणु कुमारी, रत्‍नेश,  अजयप्रतिलिपि,1) &lt;/p&gt;&lt;p&gt;विजिटर, महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय&lt;/p&gt;&lt;p&gt; विजिटर द्वारा नामित सभी सदस्‍य, कार्यकारी परिषद&lt;/p&gt;&lt;p&gt; कैबिनेट मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नयी दिल्‍ली&lt;/p&gt;&lt;p&gt; अध्‍यक्ष, विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-4305602513698285620?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/4305602513698285620/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_15.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4305602513698285620'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4305602513698285620'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_15.html' title='मीडिया विभाग के छात्रों द्वारा वहिस्कार'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S3oz5se-VmI/AAAAAAAAAEA/UsOqY5-KPD8/s72-c/Boycott+Page+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-3554479783799895315</id><published>2010-02-14T03:44:00.000-08:00</published><updated>2010-02-14T03:48:43.328-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी बात'/><title type='text'>सबसे अहम मौके पर तुम हार गये हो “विभूति”</title><content type='html'>यह महज़ उम्र का मामला नहीं होता&lt;br /&gt;सवाल, सवाल होते हैं&lt;br /&gt;जिसे तुम हर बार टाल जाते हो&lt;br /&gt;बचकाना कहकर&lt;br /&gt;तुम्हारी लड़ाईयों पर हमे यकीन है&lt;br /&gt;हमे यकीन है कि हम बचे हैं&lt;br /&gt;हमारे बच्चे मस्जिद में अब भी&lt;br /&gt;नमाज़ अदा करने जाते हैं&lt;br /&gt;थोड़ा डर सहम के साथ&lt;br /&gt;वे गुजरात में भी रह ही लेते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे जिंदा होने का सुबूत हैं&lt;br /&gt;वे लड़ाईयाँ&lt;br /&gt;जो लड़ी गयी&lt;br /&gt;जिसमे तुम भी शामिल थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना था कि&lt;br /&gt;शहर और कर्फ्यू एक साथ नहीं रहे वहाँ&lt;br /&gt;जहाँ तुम मौजूद थे&lt;br /&gt;आये भी तो किताबों में छिपकर&lt;br /&gt;तुम्हारे तबादले के बाद&lt;br /&gt;सुना है कि&lt;br /&gt;तबादला, शहर, कर्फ्यू, और चोर हैं&lt;br /&gt;तुम भी वहीं कहीं&lt;br /&gt;उम्र की बढ़त और साहस की कमी के साथ&lt;br /&gt;सुनाने वाले ने कहा था&lt;br /&gt;“मैं झूठ नहीं बोलता”&lt;br /&gt;यह बोलकर&lt;br /&gt;कोई कितना भी झूठ बोले&lt;br /&gt;कोई कैसे टोकेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या किताबें अब सिरहाने की तकिया हो गयी हैं “विभूति नारायण”&lt;br /&gt;जिसका इश्तेमाल वही करते हैं&lt;br /&gt;जो सोने की तैयारी में हैं&lt;br /&gt;अपनी कमसिन उम्र में मैने चाहा था&lt;br /&gt;और मैं खुश हूँ कि&lt;br /&gt;मेरी चाहत अब भी बची हुई है&lt;br /&gt;कि किताबें जूता बन जायें&lt;br /&gt;चलने के पहले हर आदमी के पैर कसने का&lt;br /&gt;आदमी के बदलने से&lt;br /&gt;आदमीयत से भरोसा अभी भी नहीं उठा “विभूति नारायण”&lt;br /&gt;कई लोगों के जीने की वज़ह बहुत मामूली होती है&lt;br /&gt;जबकि मामूली जीजें कई पीढ़ीयों तक हल नहीं होती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमने किताब को किताब कहा&lt;br /&gt;जिसे पढ़ा जाना चाहिये&lt;br /&gt;सिद्धान्त को सिद्धान्त कहा&lt;br /&gt;जिसे गढ़ा जाना चाहिये&lt;br /&gt;और लगा दिये हैं कई लोहार और बढ़ई&lt;br /&gt;जिन्हें चस्मा और कुदाल में फर्क करना नहीं आता&lt;br /&gt;पर तुम तो बखूबी जानते हो&lt;br /&gt;अगर चस्मे को तुम कुल्हाड़ी कहोगे&lt;br /&gt;तो कितने सारे कहेंगे कुल्हाड़ी&lt;br /&gt;और यह भी जानते हो&lt;br /&gt;कि वे क्यों कह रहे हैं&lt;br /&gt;चस्मे को कुल्हाड़ी&lt;br /&gt;जबकि तुम, वे, हम, सब&lt;br /&gt;जानते हैं कि चस्मा, चस्मा होता है कुल्हाड़ी होती है कुल्हाड़ी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक झूठी लड़ाई कितनी आसान होती है&lt;br /&gt;तब जब लोग उलझ गये हों झूठ में,&lt;br /&gt;और झूठ, झूठ कहाँ रहता है&lt;br /&gt;जबतक कोई उंगली उठाकर यह न कहे “यह रहा झूठ”&lt;br /&gt;जबकि तुम सोचो&lt;br /&gt;सच में सोचो, सच के बारे में&lt;br /&gt;उस सच के बारे में, जिसे तुम खुद से कह सको&lt;br /&gt;कि सच यह था&lt;br /&gt;तुम तलासो ईमानदारी, आदमी के इर्द-गिर्द बची रह जाती है&lt;br /&gt;उम्र से ईमानदारी का कोई सीधा नाता नहीं&lt;br /&gt;तुम्हें भी मिल ही जायेगी&lt;br /&gt;तुम्हारे कुर्ते के जेब में&lt;br /&gt;या बटन के धागे में&lt;br /&gt;कम ही सही&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह जो बचा था तुम्हारे लिये&lt;br /&gt;वे लड़ाईयां जिन्हें तुमने जीता है&lt;br /&gt;किन्हीं मोर्चों पर&lt;br /&gt;और जिनके खिलाफ तुम लड़े&lt;br /&gt;आज तुम्हारे साथ खड़े हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद सबसे अहम मौके पर तुम हार गये हो “विभूति नारायण”.&lt;br /&gt;विश्वविद्यालय के एक छात्र द्वारा भेजी गयी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-3554479783799895315?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/3554479783799895315/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_14.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/3554479783799895315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/3554479783799895315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_14.html' title='सबसे अहम मौके पर तुम हार गये हो “विभूति”'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-472549420218716784</id><published>2010-02-10T06:09:00.000-08:00</published><updated>2010-02-10T06:11:54.028-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी बात'/><title type='text'>श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के नाम एक पत्र</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: 85%; font-weight: bold;"&gt;दिल्ली 9 फरवरी 2010&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="raviwar" style="margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्रिय  विभूतिजी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अभिवादन !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उम्मीद है, स्वस्थ होंगे .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लम्बे समय  से इस उधेड़बुन में था कि चन्द बातें आप तक किस तरह संप्रेषित  करूं ?   व्यक्तिगत मुलाकात संभव नहीं दिख रही थी, सोचा पत्र के जरिए ही अपनी बात   लिख दूं.  और यह एक ऐसा पत्र हो, जो सिर्फ हमारे आप के बीच न रहे बल्कि  जिसे बाकी लोग  भी पढ़  सकें, जान सकें. इसकी वजह यही है कि पत्र में जिन  सरोकारों को मैं रखना  चाहता हूं,  उनका ताल्लुक हमारे आपसी संबंधों से  जुड़े किसी मसले से नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप को याद होगा कि महात्मा गांधी  विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर आप की  नियुक्ति  होने पर मेरे बधाई  सन्देश का आपने उसी आत्मीय अन्दाज़ में जवाब दिया था.  उन्हीं  दिनों उत्तर  प्रदेश की पुलिस द्वारा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की अनुचित  गिरफ्तारी  के  मसले को जब मैंने आप के साथ सांझा किया तब आपने अपने स्तर पर उस मामले  की   खोज-ख़बर लेने की कोशिश की थी. हमारे आपसी संबंधों की इसी सांर्द्रता का   नतीजा था  कि आप के संपादन के अंतर्गत सांप्रदायिकता के ज्वलंत मसले पर  केन्द्रित एक  किताब  में भी अपने आलेख को भेजना मैंने जरूरी समझा. इतना ही  नहीं कुछ माह पहले जब  मुझे  बात रखने के लिए आप के विश्वविद्यालय का  निमंत्रण मिला तब मैंने भी इसे  सहर्ष  स्वीकार किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अलग बात है  कि वर्धा की अपनी दो दिनी यात्रा में मेरी आप से मुलाक़ात  संभव नहीं  हो  सकी. संभवतः आप प्रशासनिक कामों में अत्यधिक व्यस्त थे. आज लगता है कि  अगर   मुलाक़ात हो पाती तो मैं उन संकेतों को आप के साथ शेअर करता -जो   विश्वविद्यालय  समुदाय के तमाम सदस्यों से औपचारिक एवं अनौपचारिक चर्चा के  दौरान मुझे मिल  रहे थे-  और फिर इस किस्म के पत्र की आवश्यकता निश्चित ही  नहीं पड़ती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यह जानकर आश्चर्यचकित था कि विश्वविद्यालय में अपने  पदभार ग्रहण करने  के बाद  अध्यापकों एवं विद्यार्थियों की किसी सभा में आप  ने छात्रों के छात्रसंघ  बनाने के  मसले के प्रति अपनी असहमति जाहिर की थी  और यह साफ कर दिया था कि आप इसकी  अनुमति  नहीं देंगे.&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;table style="border-collapse: collapse; text-align: left; margin-left: 0px; margin-right: 0px;" id="table3" bgcolor="#feea83" border="0" bordercolor="#d2d2d2" width="270"&gt;   &lt;tbody&gt;&lt;tr bgcolor="#cccccc"&gt;     &lt;td bordercolor="#FEEA83" bgcolor="#feea83"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;p class="raviwar" style="margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;यह बात भी मेरे आकलन से परे थी कि सामाजिक तौर पर  उत्पीड़ित तबके से आने  वाले एक  छात्र- सन्तोष बघेल को विभाग में सीट की  उपलब्धता के बावजूद शोध में प्रवेश  लेने के  लिए भी आंदोलन का सहारा लेना  पड़ा था और अंततः प्रशासन ने उसे प्रवेश दे  दिया था.  विश्वविद्यालय की  आयोजित एक गोष्ठी में जिसमें मुझे बीज वक्तव्य देना था,  उसकी  सदारत कर  रहे महानुभाव की ‘लेखकीय प्रतिभा’ के बारे में भी लोगों ने मुझे  सूचना दी,   जिसका लुब्बेलुआब यही था कि अपने विभाग के पाठयक्रम के लिए कई जरूरी   किताबों के  ‘रचयिता’ उपरोक्त सज्जन पर वाड्मयचैर्य अर्थात प्लेगिएरिजम के  आरोप लगे  हैं. कुछ  चैनलों ने भी उनके इस ‘हुनर’ पर स्टोरी दिखायी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल,  विगत तीन माह के कालखण्ड में पीड़ित छात्रों द्वारा प्रसारित  सूचनाओं के   माध्यम से तथा राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से में विश्वविद्यालय के बारे   में  प्रकाशित रिपोर्टों से कई सारी बातें सार्वजनिक हो चुकी हैं. अनुसूचित   जाति-जनजाति  से संबंधित छात्रों के साथ कथित तौर पर जारी भेदभाव एवं  उत्पीड़न सम्बन्धी  ख़बरें भी  प्रकाशित हो चुकी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6 दिसम्बर 2009  को डॉ. अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित रैली में शामिल  दलित   प्रोफेसर लेल्ला कारूण्यकारा को मिले कारण बताओ नोटिस पर टाईम्स आफ इण्डिया   भी लिख  चुका है. उन तमाम बातों को मैं यहां दोहराना नहीं चाहता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनवरी  माह की शुरूआत में मुझे यह भी पता चला कि हिन्दी जगत में प्रतिबद्ध   पत्रकारिता के एक अहम हस्ताक्षर श्री अनिल चमड़िया- जिन्हें आप के   विश्वविद्यालय  में स्थायी प्रोफेसर के तौर पर कुछ माह पहले ही नियुक्त  किया गया था- को  अपने पद से  हटाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन आमादा  है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर चंद दिनों के बाद यह भी सूचना सार्वजनिक हुई कि  विश्वविद्यालय की  कार्यकारिणी  परिषद की आकस्मिक बैठक करके उन्हें पद से  मुक्त करने का फैसला लिया गया और  उन्हें  जो पत्र थमा दिया गया, उसमें  उनकी नियुक्ति को ‘कैन्सिल’ करने की घोषणा की  गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं समझता हूं  कि विश्वविद्यालय स्तर पर की जाने वाली नियुक्तियां बच्चों  की   गुड्डी-गुड्डा का खेल नहीं होता कि जब चाहें हम उसे समेट लें. निश्चित तौर   पर उसके  पहले पर्याप्त छानबीन की जाती होगी, मापदण्ड निर्धारित होते  होंगे, योग्यता  को परखा  जाता होगा. यह बात समझ से परे है कि कुछ माह पहले  आप ने जिस व्यक्ति को  प्रोफेसर  जैसे अहम पद पर नियुक्त किया, उन्हें  सबसे सुयोग्य प्रत्याशी माना, वह  रातों रात  अयोग्य घोषित किया गया और  उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानून की सामान्य  जानकारी रखनेवाला व्यक्ति भी बता सकता है कि  विश्वविद्यालय  प्रशासन का  यह कदम प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के खिलाफ है. और ऐसा मामला  नज़ीर  बना  तो किसी भी व्यक्ति के स्थायी रोजगार की संकल्पना भी हवा हो जाएगी   क्योंकि किसी  भी दिन उपरोक्त व्यक्ति का नियोक्ता उसे पत्र थमा देगा कि  उसकी नियुक्ति  –‘कैन्सिल’.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जानी हुई बात है कि हिन्दी प्रदेश  में ही नहीं बल्कि शेष हिन्दोस्तां  में लोगों  के बीच आप की शोहरत एक  कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की रही है, जिसने अपने  आप को  जोखिम में डाल  कर भी साम्प्रदायिकता जैसे ज्वलंत मसले पर संवैधानिक मूल्यों  की  रक्षा  करने की कोशिश की. ‘शहर में कर्फ्यू’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से या    ‘वर्तमान साहित्य’ जैसी पत्रिका की नींव डालने के आप की कोशिशों से भी लोग   भलीभांति  वाकीफ हैं. संभवतः यही वजह है कि कई सारे लोग, जो कुलपति के तौर  पर आप की  कार्यप्रणाली से खिन्न हैं, वे मौन ओढ़े हुए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे  इत्तेफाक ही समझें कि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी  विश्वविद्यालय  अपनी  स्थापना के समय से ही विवादों के घेरे में रहा है. चाहे जनाब अशोक  वाजपेयी  का  कुलपति का दौर रहा हों या उसके बाद पदासीन हुए जनाब गोपीनाथन  का कालखण्ड  रहा हो,  विवादों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है. मेरी दिली  ख्वाहिश है कि साढ़े तीन साल  बाद जब  आप पद भार से मुक्त हों तो आप का भी  नाम इस फेहरिस्त में न जुड़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं पुरयकीं हूं कि आप मेरी इन चिंताओं  पर गौर करेंगे और उचित कदम उठाएंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपका&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुभाष गाताडे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-472549420218716784?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/472549420218716784/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_10.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/472549420218716784'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/472549420218716784'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_10.html' title='श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के नाम एक पत्र'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-6145922548350236631</id><published>2010-02-06T12:25:00.000-08:00</published><updated>2010-02-06T12:46:08.369-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी बात'/><title type='text'>अनिल चमड़िया एक अनैतिक टीचर हैं: विभूति नारायण राय को जबाब</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मीडिया फार भड़ास पर प्रकाशित साक्षात्कार के संदर्भ में .............&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S23T5FPw_XI/AAAAAAAAADw/OFlNDE9ofsE/s1600-h/hindi+vishwa+vidyalay.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5435233302920363378" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 126px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S23T5FPw_XI/AAAAAAAAADw/OFlNDE9ofsE/s400/hindi+vishwa+vidyalay.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; अफसोस, अफसोस इस बात का कि पुरानी कहावतों से विभूति जी कुछ नहीं सीख सके (उल्टा चोर कोतवाल को डांटे), अफसोस कि एक अच्छा आदमी बनने के लिये जिस सब्र की जरूरत है वह नहीं रही, अफसोस कि आप एक अच्छे छात्र भी आप नहीं बन सके, अफसोस कि आप अपने चिंतन में इतने थोथे निकले.... मसलन आप इतने झूठे निकले कि आपने अनिल चमड़िया के हेराफेरी के कारण परीक्षा तो करवायी, पर उन पर कोई कार्यवाही नहीं की, आपने यहाँ यह नहीं बताया कि उस प्रक्रिया में राम मोहन पाठक से लेकर, उप-कुलपति तक फंसे, आपने यह भी नहीं बताया कि दुबारा जो परीक्षा हुई उसमे जामिया के एक चोर गुरू और अनिल अंकित राय के सहयोगी चोर दीपक के.एम. ने कापी जाँची. क्या आप जबाब देंगे कि अनिल चमड़िया पर उस समय क्या कार्यवाही की गयी और नहीं तो क्यों?&lt;br /&gt;दरअसल एकपक्षीय रिपोर्टिंग इसे कहते हैं विभूति जी, क्या यह सच है कि आरोप वही लोग लगा रहे हैं जिनके स्वार्थ आपसे पूरे नहीं हो पाये तो क्या जो आपके साथ खड़े हैं उनके स्वार्थ पूरे हो चुके हैं या भविष्य में आप उन्हें पूरा करेंगे. जिन्दगी, संघर्ष और लड़ाईयां कई बार स्वार्थ से ऊपर उठकर भी लड़ी जाती हैं, इस तरह के खोखले तर्क निश्चिततौर पर दुनिया की जुझारु लड़ाईयों और लड़ने वालों के लिये भद्दे मजाक ही हैं. हिन्दी वि.वि. के मीडिया विभाग का रजिस्टर चेक कर लिजिये और छात्रों से पूंछ लिजिये क्या अनिल चमड़िया से अधिक और अच्छा क्लास किसी अध्यापक ने लिया है, पर आप छात्रों से पूंछने के नाम पर उनसे पूंछेगे जिन्हें स्टूडियो प्रभारी बनाने की बात या लेक्चरर बनाने की बात अनिल अंकित चला रहे हैं शायद......पर आपके कहने पर अनिल चमड़िया ने क्लास लेना शुरु किया इसको प्रस्तुत करने का आपका तरीका उनसे वाकई दुराग्रहपूर्ण लगता है. क्योंकि मामला क्लास लेने का नहीं था, मामला था कि क्लास, क्लासरूम में अनिल चमड़िया नहीं ले रहे थे और छात्रों को अपने चैम्बर में बुलाकर ४० मिनट के बजाय २ घंटे की क्लास लेते थे क्योंकि क्लास रूम में आवाज गूंजती थी. जिसपर छात्र तो खुश थे पर अनिल राय अंकित ने आपसे शिकायत की और कहा कि अनिल चमड़िया कक्षा में नहीं पढ़ाते. जिसे आप यहाँ प्रचारित कर रहे हैं क्योंकि आपके पास तर्क नहीं है. इसलिये आपकी दोनों बातें झूठी नहीं तो आधार विहीन हैं. निश्चित तौर पर जातिवादी कहने से आप जातिवादी नहीं हो जायेंगे, न ही महिला विरोधी कहने से महिला विरोधी पर आपके व्यवहार यह तय करेंगे कि आप क्या हैं. पिछले दिनों छात्रों की एक बैठक में कुछ छात्राओं ने कहा कि आप अश्लील शब्दों के साथ बात करते हैं इसलिये वे आपसे बात-चीत करने का जो कि छात्र प्रस्ताव रख रहे थे को वे छात्रायें मना कर रही थी. आपके कथन को ही वे दोहरा रही थी कि छात्र तुम लोगों को टाफी समझते हैं. तुम्हारी स्वतंत्रतायें छात्रावासों के कमरे तक ही सीमित क्यों है? व अन्य अन्य.&lt;br /&gt;गाली गलौज की भाषा में ब्लाग या कहीं भी बात करना गलत है पर अब तक अनिल चमड़िया और आपसे जुड़े इस विवाद में जितने प्रकाशन हुए हैं उनकी टिप्पणियों पर यदि शोध किया जाय तो आपके पक्ष में खड़े ज्यादातर लोगों की भाषा निहायत गंदी रही है. क्या यह पक्षधरता समरूपी चेतना का परिचायक नहीं है या फिर यह भी कहा जा सकता है कि आपकी तरफ से जो लोग लामबंद हुए हैं वे बेहद स्तर विहीन तरीके से सामने आये हैं, तो एक बार जरूर सोचना चाहिये कि ये कौन लोग हैं जो पूरे बहस को कुचर्चा में बदलना चाहते हैं क्योंकि इस पर एक स्वस्थ बहस हो इससे आपको भी एतराज न होगा. आपने ब्लाग माडरेटरों से सवाल किया कि सम्पादक के रूप में वे किसी दलित को क्यों नहीं रख लेते? इसका क्या आशय लगाया जाय क्या यह कि मसले से महत्वपूर्ण जातियां हैं. मैं आपको आपके विश्वविद्यालय का एक आंकड़ा देता हूं जिसे मैंने कहीं पढ़ा है इसलिये अगर वह स्रोत गलत हो तो मुझे क्षमा कीजियेगा आपके विश्वविद्यालय में एक मात्र छात्रावास है जिसका नाम सावित्री बाई फुले के नाम पर है, आपके वि.वि. में एक मात्र अस्पताल है जो अम्बेडकर के नाम पर है, आपके वि.वि. में अम्बेडकर जनजातीय अध्ययन जैसे विभाग चलते हैं, आपके वि.वि. में छात्रों की कुल संख्या २४७ है जिसमे १०० से अधिक अम्बेडकर स्टूडेंट फोरम के सदस्य है, यानि दलित छात्र बहुलता में हैं और आपके विश्वविद्यालय में ही एक माह तक दलित छात्रों को आंदोलन करना पड़ता है और न्याय नहीं मिल पाता, आपके द्वारा ही दलित अध्यापक को अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस की रैली में भाग लेने पर धमकाया जाता है, जो आस्थायी नियुक्तियां आपने की हैं उसमे एक भी दलित शामिल नहीं है.&lt;br /&gt;ये दस्तावेज आप पढ़ सकते हैं&lt;br /&gt;१- &lt;a href="http://janatantra.com/2010/02/05/other-side-of-vibhuti-narayan-rai"&gt;सुनो विभूति, तुम सेकुलर जातिवादी हो&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;२- &lt;a href="http://janatantra.com/2010/02/06/prof-reply-to-vc-vibhuti-narayan-rai"&gt;सारे नोटिस दलित शिक्षकों को, जवाब दो विभूति &lt;/a&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लिहाज़ा हम आपके इस झूठ, तथ्यविहीन और अनैतिक वक्तव्यों का क्या मायने लगायें. क्या यह कि प्रोपोगेंडा करके आप चल रही इन बहसों पर “मोहल्ला में कर्फ्यू” लगवाना चाहते हैं.&lt;br /&gt;आपका पूर्व और सकारात्मक कार्यों का अब भी प्रसंसक छात्र.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;वर्धा मेल से प्राप्त&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-6145922548350236631?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/6145922548350236631/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_06.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6145922548350236631'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6145922548350236631'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_06.html' title='अनिल चमड़िया एक अनैतिक टीचर हैं: विभूति नारायण राय को जबाब'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S23T5FPw_XI/AAAAAAAAADw/OFlNDE9ofsE/s72-c/hindi+vishwa+vidyalay.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-1392564018122552315</id><published>2010-02-06T10:09:00.000-08:00</published><updated>2010-02-06T10:30:27.973-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी बात'/><title type='text'>विभूति नारायण राय......Unscrupulous …है.. - नामवर सिंह</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2204kgiToI/AAAAAAAAADg/yXEACDxEpFY/s1600-h/namvar+to+kashi+-RNM.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5435199209271873154" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 292px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2204kgiToI/AAAAAAAAADg/yXEACDxEpFY/s400/namvar+to+kashi+-RNM.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S22xNWYCaEI/AAAAAAAAADQ/j0lkcpaqpuw/s1600-h/namvar+to+kashi+-RNM.jpg"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;श्री नामवर सिंह ने श्री काशीनाथ सिंह को निम्न पत्र लिखा था-जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालयनई दिल्ली-11000678-04-८४&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;strong&gt;प्रिय काशी,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;श्री विभूति नारायण राय के बारे में जो कुछ सुना है उससे उनके बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है। वे बड़े महत्वाकांक्षी आदमी हैं और महत्वाकांक्षी आदमी कुछ भी कर सकता है। अंग्रेजी में ऐसा आदमी Unscrupulous कहा जाता है। उनके इर्द-गिर्द ऐसे ही खाऊ-कमाऊ लेखकनुमा जीव फिरते रहते हैं। मुझे भय है कि तुम्हें वे किसी चक्कर में न फँसा &lt;span class=""&gt;दें। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;तुम्हारा नामवर&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;हिन्दी के&lt;/span&gt; भीष्मपितामह नामवर सिंह ( NAMAVAR SINGH ) ने यह पत्र हिन्दी के प्रख्यात कहानीकार अपने सगे छोटे भाई काशीनाथ सिंह ( KASHINATH SINGH ) को लिखा है। काशी के नाम नामवर के लिखे पत्रों का संकलन राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली , ने “काशी के नाम ” शीर्षक से छापा है। 2006 में छपी 364 पेज की यह पुस्तक 400 रूपये की है। नामवर जी ने विभूति नारायण राय के बारे में जो लिखा है वह इस पुस्तक के पेज 252 पर छपा है।जिसमें नामवर सिंह ने लिखा है-श्री विभूति नारायण राय के बारे में जो कुछ सुना है उससे उनके बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है। वे बड़े महत्वाकांक्षी आदमी हैं और महत्वाकांक्षी आदमी कुछ भी कर सकता है। अंग्रेजी में ऐसा आदमी Unscrupulous कहा जाता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt;.....एस.चन्द एंड कम्पनी,रामनगर,नईदिल्ली से प्रकाशित फादर कामिल बुल्के की लिखी“अंगरेजी हिन्दी कोश ” के 1992 के संस्करण के पेज 804 परUNSCRUPULOUS शब्द का अर्थ दिया है- अनैतिक, चरित्रहीन, &lt;span class=""&gt;बेईमान.&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;नामवर सिंह ने लिखा है-...अंग्रेजी में ऐसा आदमी Unscrupulous कहा जाता है।...इस वाक्य को पूरा का पूरा हिन्दी में लिखे तो वाक्य होगा-... ऐसा आदमी अनैतिक, चरित्रहीन, बेईमान कहा जाता है ।....यह लिखने पर नामवर सिंह का काशी के नाम लिखा यह पत्र इस तरह पढ़ा जायेगा-प्रिय काशी,श्री विभूति नारायण राय के बारे में जो कुछ सुना है उससे उनके बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है। वे बड़े महत्वाकांक्षी आदमी हैं और महत्वाकांक्षी आदमी कुछ भी कर सकता है। ऐसा आदमी अनैतिक, चरित्रहीन, बेईमान कहा जाता है। उनके इर्द-गिर्द ऐसे ही खाऊ-कमाऊ लेखकनुमा जीव फिरते रहते हैं। मुझे भय है कि तुम्हें वे किसी चक्कर में न फँसा &lt;span class=""&gt;दें। &lt;em&gt;&lt;strong&gt;तुम्हारा नामवर&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र के चांसलर हैं नामवर सिंह।और पुलिस अफसर विभूति नारायण राय(VIBHUTI NARAYAN RAI / V.N.RAI ) इस विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। यह केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। जिस समय केन्द्र में वामपंथियों के सहयोग से मनमोहन सिंह की सरकार थी ,उस समय, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति पद पर पुलिस अफसर विभूति नारायण राय की 5 साल के लिए नियुक्ति हुई। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-1392564018122552315?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/1392564018122552315/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/unscrupulous.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/1392564018122552315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/1392564018122552315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/unscrupulous.html' title='विभूति नारायण राय......Unscrupulous …है.. - नामवर सिंह'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2204kgiToI/AAAAAAAAADg/yXEACDxEpFY/s72-c/namvar+to+kashi+-RNM.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-9190671114629132631</id><published>2010-02-04T23:04:00.002-08:00</published><updated>2010-02-04T23:14:47.712-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी बात'/><title type='text'>विभूति जी सुनिये अनिल चमड़िया सराब पीते हैं, गलत करते हैं न</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;यह छूठ जब कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा फैलाया गया तो अनिल चमड़िया ने एक लेख लिखा था जो कई अखबारों में छपा था इसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है- वैसे यहाँ यह मसला नहीं था कि सराब पीने पर बात की  जाती पर इससे यह पता जरूर लगाया जा सकता है कि अनिल चमड़िया को किस-किस रूप में इस विश्वविद्यालय में प्रताड़ित होना पड़ा है और अन्य ऐसे कितने अध्यापक हैं जो प्रताड़ित हो रहे हैं पर जुबान नहीं खोल पा रहे हैं।&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सत्ता का क्रूर प्रचार तन्त्र /अनिल चमड़िया&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अगर आप बिना दूध की चाय पीते हों और उसे शीशे के गिलास में पीते हो तो आपको आसानी से शराबी कहा जा सकता है. दिन में कई बार ऐसी चाय पीते हों और कई लोगों के साथ पीते हो तो आपके घर को शराबियों के अड्डे के रूप में प्रचारित किया जा सकता है. हमारे समाज में प्रचार का गहरा असर है. प्रचार का एक ढाँचा है जिस पर समाज में वर्चस्व रखने वालों का नियंत्रण हैं. बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब गणेश की मूर्तियों के दूध पीने के करिश्मे को वास्तविकता के रूप में दुनिया के बड़े हिस्से में कई घंटों में स्थापित कर दिया गया था. यह काम किसी मीडिया के प्रचार के जरिये नहीं हुआ था. मीडिया के मंच प्रचार के माध्यम तो हैं लेकिन हर तरह के प्रचार मीडिया द्वारा ही स्थापित नहीं होते हैं. जैसे किसी भी छोटे बड़े संस्थान में किसी के बारे में किसी तरह के प्रचार को जब स्थापित किया जाता है तो उसमें किस माध्यम की भूमिका होती है?दरअसल प्रचार अनिवार्य तौर पर किसी राजनीति से जुड़ा होता है. इसमें सच को देखना बेहद मुश्किल काम होता है.अमेरिका ने इराक के राष्ट्रपति शहीद सद्दाम के खिलाफ लंबे समय तक अभियान चलाया. अमेरिका ने कहा कि इराक के पास जनसंहारक रासायनिक हथियार हैं और उससे पूरी दुनिया में तबाही लाई जा सकती है. यह अभियान लगातार चलता रहा और जब से ये अभियान शुरू हुआ तब से उसे सच मानने वालों की संख्या तब तक बढ़ती रही जबतक कि अमेरिका ने सबसे पुरानी सभ्यताओं के बीच विकसित देश इराक को तबाह नहीं कर दिया. बाद में यह पता चला कि इराक के पास ऐसे हथियार नहीं थे . इस प्रचार का मकसद केवल सद्दाम हुसैन को खत्म करना था और सीना तानकर खड़े होने वाले इराक जैसे देश को झुकना सिखाना था. बाद में दुनिया भर की जनवादी ताकतें हाथ मलती रहीं लेकिन उससे क्या होता है.प्रचार के ढांचे को समझने के लिए एक चीज जरूरी होती है कि किसी भी तरह के प्रचार को किस तरह से खड़ा किया जा सकता है. एक उदाहरण के जरिये इसे समझा जा सकता है. यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज करने वाली एक संस्था की समिति के एक सदस्य ने एक दिन कई लोगों के बीच खड़े होकर संस्था की अध्यक्ष से कहा कि वो उन्हें अकेले में यौन उत्पीड़न की एक शिकायत पर की गई जांच की रिपोर्ट को नहीं दिखा सकता है. अध्यक्ष जांच समिति के उस सदस्य को भौचक देखती रही. उसे आश्चर्य हुआ कि समिति का सदस्य उसे ऐसा क्यों कह रहा है जबकि उन्होंने तो कभी भी उस सदस्य से उस रिपोर्ट को दिखाने के लिए नहीं कहा. अकेले या दुकेले की बात ही कहाँ से उठती है. दरअसल समिति का सदस्य जिसके खिलाफ शिकायत थी उसके प्रति सहानुभूति रखता था. वह दो बातों को ध्यान में रखकर अपने प्रचार की सामग्री को बड़े दायरे में भेजना चाहता था. पहली बात तो वह तकनीकी रूप से गलत नहीं बोल रहा है इसके प्रति सावधनी बरत रहा था. दूसरे वह यह संदेश भेजना चाहता था कि संस्था की अध्यक्ष इस मामले में कुछ खास व्यक्तिगत दिलचस्पी ले रही है. जिन लोगों ने समिति के सदस्य से संस्था की अध्यक्ष से यह कहते सुना उन्होंने तत्काल ही दूसरे लोगों से कहना ये शुरू कर दिया कि संस्था की अध्यक्ष जाँच समिति की रिपोर्ट को अकेले देखना चाहती थी. इस तरह से एक प्रचार अभियान की शुरुआत होती है . जाहिर सी बात है कि जो इस तरह का प्रचार अभियान विकसित करना चाहता है वह इस बात को लेकर अपनी पक्की अवधरणा बनाए हुए है कि समाज में प्रचार का जो ढाँचा विकसित है यह सामग्री उसकी खुराक के रूप में इस्तेमाल हो जाएगी. लेकिन अध्यक्ष इस तरह के प्रचार की बारीकियों को नहीं समझती थी और केवल अपने आदर्श और नैतिकता के तहत जाँच को एक अंजाम तक पहुँचते देखना चाहती थी. इस तरह के प्रचार बड़े स्तर पर किस तरह से विकसित किए जाते हैं इसे संसद की रिपोर्टिंग के दौरान भी इस लेखक ने अनुभव किया. संसद में अक्सर सवाल उठाए जाते हैं कि फलां समाचार पत्रा में इस आशय के समाचार प्रकाशित हुए हैं. सरकार को इस पर जवाब देना चाहिए. दूसरी तरफ स्थिति यह है कि समाचार पत्रा यदि किसी भी तरह के समाचार को प्रकाशित करता है तो वह गलत भी हो सकता है और बेबुनियाद भी हो सकता है. लेकिन वह इसके लिए किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. उसे जवाबदेह होना चाहिए ये एक अपेक्षा है और ये एक दूसरी बात है.अब अखबार में छपने के बाद संसद का सदस्य उसे अपना आधर बना लेता है. प्रचार का आधर किस तरह से विकसित किया जा रहा है इसे समझना जरूरी होता है. फिर संसद में पूछे गए सवाल पर अखबार ये समाचार बना सकता है कि संसद में ये सवाल पूछा गया. संसद में सवाल के पहुंचने के बाद प्रचार को विश्वसनीयता का भी एक आधर मिल जाता है. संसद के प्रति समाज का एक भरोसा है. इस तरह बार बार उलटपफेर से एक प्रचार अभियान विकसित होता है. समाज और सत्ता पर वर्चस्व रखने वाले लोग इसी तरह से प्रचार के ढाँचे का इस्तेमाल करते हैं. माध्यमों से वे अपने प्रचार की गति को तेज करते हैं. मीडिया ने इस काम में बहुत मदद की है.समाज में खबरें सुनना, पढ़ने और देखने की आदत का विकसित होना ही महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि उसमें किसी भी उस तक पहुँचने वाली सामग्री के भीतर देख पाने की क्षमता का विकास भी जरूरी होता है. वह किसी भी सामग्री का विश्लेषण करने की क्षमता का विकास नहीं करेगा तो वह हर वक्त शासकों के प्रचार अभियान का शिकार होगा. काली चाय शराब के रूप में उसे दिखाई जाएगी वह उसे मानने के लिए अभिशप्त होगा. मीडिया के विस्तार और उसके बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर तो समाज से और भी गहरी दृष्टि विकसित करने की अपेक्षा की जाती है.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-9190671114629132631?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/9190671114629132631/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_04.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/9190671114629132631'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/9190671114629132631'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_04.html' title='विभूति जी सुनिये अनिल चमड़िया सराब पीते हैं, गलत करते हैं न'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-1872576310500001218</id><published>2010-02-04T22:24:00.001-08:00</published><updated>2010-02-04T22:43:24.565-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>प्रो. अनिल चमड़िया को हटाये जाने की निंदा- अम्बेडकर स्टूडेंट फोरम</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2u9vlPpRGI/AAAAAAAAADI/gWB3_cCeIkU/s1600-h/asf.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5434646000501867618" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 84px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2u9vlPpRGI/AAAAAAAAADI/gWB3_cCeIkU/s200/asf.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; वर्धा: ०३-०२-१०&lt;br /&gt;आज दिनांक ३/२/१० को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में अम्बेडकर स्टूडेन्ट फोरम की केन्द्रीय कार्यकारिणी की एक बैठक हुई इसमे विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दलितविरोधी कार्यवाहियों के खिलाफ आंदोलन को और तेज करने की रूपरेखा पर विचार किया गया फोरम की तरफ से एक निंदा प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसमे जनसंचार विभाग के प्रोफेसर अनिल चमड़िया को कुलपति द्वारा हटाये जाने की घोर भर्त्सना की गयी. निंदा प्रस्ताव में यह कहा गया कि प्रो. अनिल चमड़िया देश के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी और पत्रकार हैं. वे लगातार दलित, शोषित और वंचित तबकों के लिये लिखते रहे हैंऔर आंदोलनो में हिस्सा भी लेते रहे हैं. हमेशा न्याय और सच का पक्ष लेने वाले प्रो. चमड़िया वि.वि. में बेहद लोकप्रिय प्राध्यापक रहे हैं और छात्रों के अकादमिक विकास के लिये हमेशा तत्पर और सक्रिय रहे हैं. सामंती और जातिवादी कुलपति विभूति नरायण राय को यही रास नहीं आया और उन्होंने प्रो. चमड़िया को साजिश के तहत वि.वि. से हटा दिया.&lt;br /&gt;फोरम ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अम्बेडकर की भूमि वर्धा में दलित विरोधी किसी भी कदम को हम और बर्दास्त नहीं करेंगे. कार्यकारिणी ने प्रो. चमड़िया के प्रति वि.वि. प्रशासन के इस जातिवादी और शाजिसाना कदम के खिलाफ आंदोलन तेज करने का निर्णय लिया है. आज से एक हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है जिसे राष्ट्रपति, मानव संसाधन विकास मंत्री और यू.जी.सी. को भेजा जायेगा. फोरम ने वि.वि. के सभी छात्रों से यह अपील की है कि वे विश्वविद्यालय के छात्र विरोधी, सामंती नजरिये के खिलाफ एक जुट हों और वि.वि. के प्रत्येक कार्यक्रम का तब-तक वहिस्कार करें जब तक एक लोकतांत्रिक स्थिति कायम नहीं की जाती. गौरतलब है कि पिछले दिनों आयोजित “कथा-समय” का भी फोरम के सदस्यों ने पूरी तरह वहिस्कार किया. इन स्थितियों के बने रहने तक विश्वविद्यालय के दलित छात्र वि.वि. में भविष्य में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों का भी वहिस्कार जारी रखेंगे. फोरम ने चेतावनी दी कि यदि प्रो. अनिल चमड़िया को वि.वि. में वापस नहीं लाया गया तो यहाँ का दलित छात्र समुदाय चुप नहीं बैठेगा और आन्दोलन को व्यापक स्तर पर छेड़ा जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;केन्द्रीय सदस्य&lt;br /&gt;अम्बेडकर स्टूडेन्ट फोरम&lt;br /&gt;म.गा.अ.हि.वि.वि., वर्धा&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;वर्धा मेल से प्राप्त&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-1872576310500001218?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/1872576310500001218/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/1872576310500001218'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/1872576310500001218'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='प्रो. अनिल चमड़िया को हटाये जाने की निंदा- अम्बेडकर स्टूडेंट फोरम'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2u9vlPpRGI/AAAAAAAAADI/gWB3_cCeIkU/s72-c/asf.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-8294079118532136065</id><published>2010-01-30T21:41:00.000-08:00</published><updated>2010-01-30T21:44:58.682-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपील'/><title type='text'>एक अपील छात्रों, पत्रकारों और देश के भद्रजनों से</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt; विस्फोट फार मीडिया पर दरोगा साब ने एक साक्षात्कार में कहा- कहने दीजिये कहने से क्या होता है, यह जो कुछ उनके बारे में छप रहा था उसकी प्रतिक्रिया के तौर पर था. अगर कहने दीजिये कहने से कुछ नहीं होता, बोलने दीजिये बोलने से कुछ नहीं होता, लिखने दिजीये लिखने से कुछ नहीं होता, तो हे दुनिया के लेखकों वक्ताओं यह दरोगा आपको निकम्मा समझता है, हे सुधी पत्रकारों इस दरोगा से पूछो कि क्या करें कि कुछ हो और हे साहित्य शिल्पियों तुमने अपने जीवन में परिश्रम करके जो कुछ गढ़ा है उसे यह तथाकथित पुलिस कथाकर व्यर्थ बता रहा है. क्योंकि अब तक आप लोगों ने समाज की संरचना और घटना को कहा ही तो है. तो कहने से कुछ नही होता तो क्या भूमिहार दरोगा की बात मान ली जाय और अब कहना बंद किया जाय क्योंकि बहुत कह चुके आप सब अब हमे दरोगा साब की चाहत पूरी करनी चाहिये और कहने के बजाय कुछ करना चाहिये. तो हे भद्रजनों, हे छात्रों क्या मुंतजर अल जैदी से तुम सबने कुछ नहीं सीखा. क्या दुनिया की इतनी बड़ी घटना बिना सीख के दफ़्न हो गयी. तो हम अपील करते हैं देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों, पत्रकारों, व देश के भद्र जनों से कि इसका कार्यान्वयन अब किया जाय और दरोगा जी की इच्छा पूरी हो. बुश का आना एक बार हुआ था पर इनका तो ठिकाना ही यही है हम इनके दिये बयान को झूठा न साबित होने दें.&lt;br /&gt;उसी साक्षात्कार में दरोगा साब ने यह भी कहा कि मुझे पता ही नहीं था कि अनिल चमड़िया दलित हैं यह सच्चाई है सच में उन्हें नहीं पता था कि अनिल चमड़िया दलित हैं दरअसल अपनी इस व्यस्त जिंदगी में उन्हें पढ़ने लिखने का कहाँ समय मिल पाता है शाम हुई तो खान-पान चला और यह तो पूरा विश्वविद्यालय जानता है कि फिर रात जल्दी ही सो जाते है सर, ऐसा अमित विश्वास का कहना है अब भला वो झूठ कैसे बोल सकता है शायद इसीलिये एक मात्र नेक छात्र मिथिलेश तिवारी के बाद अमित विश्वास हैं. तो इन्हें कैसे पता चलता कि अनिल चमड़िया दलित हैं ये तो भूमिहार या सवर्ण समझ के नियुक्ति ही किये थे और जब पता चला तो भूल सुधार ली है अब इंसान हैं गलती तो इंसान ही करता है.&lt;br /&gt;कथा समय में छात्र-छात्राओं ने अघोषित बहिस्कार किया २४७ छात्रों में ३०-३५ की ही उपस्थिति रही. पर पहले दिन उपस्थित छात्रों, जिनमे मैं भी सम्मलित हूँ क्या आपने ध्यान से इनका वक्तव्य नहीं सुना ये नये कथाकारों में कोई आंदोलन खड़ा करने की ताकत नहीं देखते भला सोचिये कि जब तक साहित्य में दरोगा मौजूद है किसी की क्या मजाल कि लिखे और जो क्लासिक इन्होंने रचा है वह सब तो आपने पढ़ा ही होगा. पिछले बरस दरोगा जी की नियुक्ति जब हिन्दी वि.वि. के थाने में हुई या कहें जब इनका तबादला हुआ शायद तबादला शब्द उन्हें भी प्रिय लगे तो विश्वविद्यालय में लोकतंत्र लाने की बात कर रहे थे पर लोकतंत्र ऐसी चीज है जो बड़े संघर्ष से मिलती है इस समय महगायी इतनी बढ़ गयी है और लोकतंत्र इतना कम हो गया है कि पूरे देश में लोकतंत्र के लाले पड़े हैं सो जितना भी लोकतंत्र मिला अकेले रख लिये जो बचा सो रिश्तेदारों को दे दिया उसके बाद जाति बिरादरी को अब बचा नहीं तो छात्रों को खाक लोकतंत्र देते सो या तो इनसे लोकतंत्र छीन लिया जाय या फिर इसी तानाशाही में जिया जाय पर इसमे भी दिक्कत है कि हर वक्त ये खुद भी लोकतंत्र लेकर नहीं चलते, उन्हें इसके छीने जाने का भय है तो कभी राकेश श्रीवास्तव तो कभी नदीम हसनैन, कभी अनिल राय अंकित को दिये रहते हैं. तो सबसे बड़ी समस्या है लोकतंत्र को पाने की दोस्तों, यह एक सब्र का काम है. अभी दलित अध्यापक कारुन्यकरा और सुनील कुमार व कुछ अन्य छात्रों का इनकाउंटर होना बाकी है. आप इंतजार करें.&lt;br /&gt;तो देश के भूमिहारों एक हो, तुम मुझे घूस दो मैं तुम्हें नौकरी दूंगा, दलितों विश्वविद्यालय छोड़ो, छात्राओं अपने कमरे में कैद रहो, यह विश्वविद्यालय तब-तक तरक्की नहीं कर सकता जब तक चोरों की जमात विश्वविद्यालय पर काबिज नहीं हो जाती. शायद यही वे परिवर्धित नारे हैं जो दरोगा साब के मन-मस्तिस्क में गूंजते हैं जिससे वे लोकतंत्र बहाल करना चाहते हैं.&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-8294079118532136065?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/8294079118532136065/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_277.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/8294079118532136065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/8294079118532136065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_277.html' title='एक अपील छात्रों, पत्रकारों और देश के भद्रजनों से'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-4168695918668564832</id><published>2010-01-30T01:04:00.001-08:00</published><updated>2010-01-30T04:24:41.007-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तानाशाही'/><title type='text'>सनातन सिस्टम में भी फैसला करने का अधिकार पण्डितों व भूमिहारों के हाथ में था- विजय प्रताप</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2P6RUJ-kXI/AAAAAAAAACw/sWNILUX6sSE/s1600-h/untitled2.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5432460750914228594" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 213px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2P6RUJ-kXI/AAAAAAAAACw/sWNILUX6sSE/s400/untitled2.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;em&gt;विजय प्रताप राजस्थान पत्रिका के पत्रकार हैं.&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अनिल चमड़िया एक 'इडियट' टीचर है। ऐसे 'इडियट्स' को हम केवल फिल्मों में पसंद करते हैं। असल जिंदगी में ऐसे 'इडियट' की कोई जगह नहीं। अभी जल्द ही हम लोगों ने 'थ्री इडियट' देखी है। उसमें एक छात्र सिस्टम के बने बनाए खांचे के खिलाफ जाते हुए नई राह बनाने की सलाह देता है। यहां एक अनिल चमड़िया है, वह भी गुरू शिष्य परम्परा की धज्जियां उड़ाते हुए बच्चों से हाथ मिलाता है, उनके साथ एक थाली में खाता है। उन्हें पैर छूने से मना करता है। कुल मिलाकर वह हमारी सनातन परम्परा की वाट लगा रहा है। महात्मा गांधी के नाम पर बने एक विष्वविद्यालय में यह प्रोफेसर एक संक्रमण की तरह अछूत रोग फैला रहा है। बच्चों को सनातन परम्परा या कहें कि सिस्टम के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। दोस्तों, यह सबकुछ फिल्मों में होता तो हम एक हद तक स्वीकार्य भी कर लेते। कुछ नहीं तो कला फिल्म के नाम पर अंतरराश्ट्ीय समारोहों में दिखाकर कुछ पुरस्कार-वुरस्कार भी बटोर लाते। लेकिन साहब, ऐसी फिल्में हमारी असल जिंदगी में ही उतर आए यह हमे कत्तई बर्दाश्त नहीं। 'थ्री इडियट' फिल्म का हीरो एक वर्जित क्षेत्र (लद्दाख) से आता था। असल जिंदगी में यह 'इडियट' चमड़िया (दलित) भी उसी का प्रतिनिधित्व कर रहा है। ऐसे तो कुछ हद तक 'थ्री इडियट' ठीक थी। हीरो कोई सत्ता के खिलाफ चलने की बात नहीं करता। चुपचाप एक बड़ा वैज्ञानिक बनकर लद्दाख में स्कूल खोल लेता है। लेकिन यहां तो यह 'इडियट' सत्ता के खिलाफ भी लड़कों को भड़काता रहता है। हम शुतुमुर्ग प्रवृत्ति के लोग सत्ता व सनातन सिस्टम के खिलाफ ऐसी बाते नहीं सुन सकते।सो, साथियों हमारे ही बीच से महात्मा गांधी अंतरराश्ट्ीय हिंदी विष्वविद्यालय के कुलपति या यूं कहें कि सनातन गुरुकुल परम्परा के रक्षकद्रोणाचार्य के अवतार वी एन राय साहब ने इस परम्परा की रक्षा का बोझ उठा लिया है। वह अपनी एक पुरानी गलती (जिसमें कि उन्होंने छात्रों के बहकावे में आकर चमड़िया को प्रोफेसर नियुक्त करने की भूल की) सुधारना चाहते हैं। राय साहब को अब पता चल गया है कि गलती से एक कोई एकलव्य भी उनके गुरुकुल में प्रवेश पा चुका है। दुर्भाग्यवश अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं (नहीं तो कोई अंगुली काटने जैसा ऐपीसोड करते) इसलिए चमड़िया को बाहर निकालने के लिए थोड़ा मुष्किल हो रहा है। तब एकलव्य के अंगुली काटने पर भी इतनी चिल्ल-पौं नहीं मची थी जितने इस कथित लोकतंत्र में कुछ असामाजिक तत्व कर रहे हैं। राय साहब आपके साथ हमें भी दुख है कि इस सनातन सिस्टम में लोकतंत्र के नाम पर ऐसे चिल्ल-पौं करने वालों की एक बड़ी फौज तैयार हो रही है। आपने ‘साधु की जाति नहीं पूछने वाली’ मृणाल पाण्डे जी के साथ अपने ऐसे इडियटों को सिस्टम से बाहर करने का जो फैसला किया है, वो अभूतपूर्व है। इसी इडियट ने हमारी मुख्यधारा की मीडिया के सामने आइना रख दिया था, जिसकी वजह से हमें कुछ दिनों तक आइनों से भी घृणा होने लगी थी। हम आइनें में खुद से ही नजर नहीं मिला पा रहे थे। वो तो धन्य हो मृणाल जी का जिन्होंने "साधु को आइना नहीं दिखाना चाहिए उससे केवल ज्ञान लेना चाहिए" का पाठ पढाया.&lt;br /&gt;ठीक ही किया जो अपने विष्णु नागर जैसे छोटे कद के आदमी को मृणाल जी व खुद के समकक्ष बैठाने की बजाए उनका इस्तीफा ले लिया। हमारे सनातन सिस्टम में सभी के बैठने की जगह तय है। उसे उसके कद के हिसाब से बैठाना चाहिए। मृणाल जी की बात अलग है। वो कोई चमाइन नहीं, पण्डिताइन हैं, उनका स्थान उंचा है। सनातन सिस्टम में भी फैसला करने का अधिकार पण्डितों व भूमिहारों के हाथ में था, आप उसे जिवित किए हुए हैं हिंदू सनातन धर्म को आप पर नाज है।साहब आप तो पुलिस में भी रहे हैं। हम जानते हैं कि आपको सब हथकंडे आते हैं। एक और दलितवादी जिसका नाम दिलीप मंडल है आप की कार्यषैली पर सवाल उठा रहा है। कहता है कि आपने एक्जिक्यूटिव कांउसिल से चमड़िया को हटाने के लिए सहमति नहीं ली। उस मूर्ख को यह पता ही नहीं की द्रोणाचार्य जी को एकलव्य की अंगुली काटने के लिए किसी एक्जिक्यूटिव कांउसिल की बैठक नहीं बुलानी पड़ी थी। आप तो फैसला "आन द स्पाट" में विश्वाश करते हैं। सर जी, यह तो लोकतंत्र के चोंचले हैं। और आप तो पुलिस के आदमी हैं, वहां तो थानेदार जी ने जो कह दिया वही कानून और वही लोकतंत्र है। लोग कह रहे हैं, साहब कि जिस मिटिंग में चमड़िया को हटाने का फैसला हुआ उसमें बहुत कम लोग थे। उन्हें क्या पता कि जो आये थे वह भी इसी शर्त पर आए थे कि सनातन सिस्टम को बचाए रखने के लिए सभी राय साहब को सेनापति मानकर उनका साथ देंगे। जो खिलाफ जाते आप ने बड़ी चालकी से उन्हें अलग रख दिया। वाह जी साहब, इसी को कहते हैं सवर्ण बुद्धि। आप वहां हैं तो हमें पूरा भरोसा है कि वह विष्वविद्यालय सुरक्षित (और ऐसे भी साहब जहां पुलिस होगी वहां सुरक्षा तो होगी ही) हाथों में है। साब जी, हमने गांव के छोरों से कह दिया है - यह लंठई-वंठई छोड़ों। इधर-उधर से टीप-टाप कर बीए, ईमे कर लो। बीयेचू चले जाओ, कोई पंडित जी पकड़ कर दुई चार किताबे टीप दो। फिर तो आप हईये हैं। एचओडी नहीं तो कम से कम प्रुफेसर-व्रुफेसर तो बनवाईये दीजिएगा। और साहब हम आपके पूरा भरोसा दिलाते हैं यह लौंडे 'अनिल चमड़िया' जैसा इडियट नहीं 'अनिल अंकित राय' जैसा चतुर बनकर आपका नाम रौशन करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;नई पीढ़ी ब्लाग से साभार&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-4168695918668564832?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/4168695918668564832/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4168695918668564832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/4168695918668564832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html' title='सनातन सिस्टम में भी फैसला करने का अधिकार पण्डितों व भूमिहारों के हाथ में था- विजय प्रताप'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2P6RUJ-kXI/AAAAAAAAACw/sWNILUX6sSE/s72-c/untitled2.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-6361504809759330331</id><published>2010-01-29T19:56:00.000-08:00</published><updated>2010-01-29T20:03:31.103-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>एक सही नियुक्ति को भी खा गये विभूति नरायन राय- युवा कथाकार चन्दन पान्डेय</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2OvgJb4p1I/AAAAAAAAACo/VQneCiRKFNc/s1600-h/chandan-pandey.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 80px; height: 80px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2OvgJb4p1I/AAAAAAAAACo/VQneCiRKFNc/s400/chandan-pandey.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5432378542362502994" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;परसों रात साढ़े ग्यारह बजे हिसार के होटल में चेक-इन कर रहा था जब चन्द्रिका का फोन आया। उसके मार्फत यह खबर मिली कि अनिल चमड़िया को महात्मा गान्धी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। इस कुकर्म को चाहे जो नाम दिया जाये, इसके पक्ष में जो तर्क रखे जायें, मैं यही समझ पाया कि अनिल चमड़िया की नौकरी छीन ली गई। कुछ बड़े नामों की एक मीटिंग बुलाई गई और कुछ नियमों का आड़ ले सब के सब उनकी नौकरी खा गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे समाज से विरोध का स्वर तो गायब हो ही रहा है, विरोध में उठने वाली आवाजों के समर्थक भी कम हो रहे हैं। यह सरासर गलत हुआ। मेरे पास एक तल्ख उदाहरण है। बचपन की बात है, गाँव में जब हम नंग-धड़ंग बच्चों के बीच कोई साफ सुथरा कपड़ा पहन कर आ जाता था, विशेष कर चरवाही में, तो बड़ी उम्र के लड़के उन बच्चों का मजाक उड़ाते थे और कभी कभी पीट भी देते थे। किसी ना किसी बहाने से,उन बच्चों को जानबूझकर मिट्टी में लथेड़ देते थे। आप समझ गये होंगे मैं कहना क्या चाहता हूँ?&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;वजहें जो भी हों सच यह है कि अनिल चमड़िया के विशद पत्रकारिता अनुभव से सीखने समझने के लिये विश्वविद्यालय तैयार नही था। वरना जिस कुलपति ने नियुक्ति की, उसी कुलपति को छ: महीने में ऐसा क्या बोध हुआ कि अपने द्वारा की गई एक मात्र सही नियुक्ति को खा गया।(मैं चाहता हूँ कि पिछली पंक्ति मेरे मित्रों को बुरी लगे)। मृणाल पाण्डेय, कृष्ण कुमार, गोकर्ण शर्मा, गंगा प्रसाद विमल और ‘कुछ’ राय साहबों ने अनिल की नियुक्ति का विरोध किया तो इसका निष्कर्ष यही निकलेगा कि पत्रकारिता जगत की उनकी समझ कितनी थोथी है? यह समय की विडम्बना है कि पत्रकारिता जगत में सिर्फ और सिर्फ सम्बन्धो का बोलबाला रह गया है। कितने पत्रकार मित्र ऐसे हैं जो नींद में भी किसी पहुंच वाली हस्ती से बात करते हुए पाये जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य इसका कि कई लोग यह कहते हुए पाये गये: अनिल को विश्वविद्यालय के विपक्ष में बोलने की क्या जरूरत थी। इन गये गुजरे लोगों को यह समझाने की सारी कोशिशे व्यर्थ हैं कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज उठाना कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसकी सजा में किसी की नौकरी छिन जाये। वर्धा में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जिसके खिलाफ सख्त आवाज उठनी चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये हर कोई जानता है कि पात्रता के बजाय सम्बन्धों और ताकत के सहारे चल रही इस दुनिया में विभूति नारायण राय को कोई दोषी नहीं ठहरायेगा। जिस एक्ज्यूटिव काउंसिल के लोगों ने इस धत-कर्म में कुलपति का साथ दिया है उन्हे भी उनका हिस्सा दिया जायेगा। वैसे भी 1995 से अखबार देखता पढ़ता रहा हूँ पर आज तक मृणाल का कोई ऐसा आलेख या कोई ऐसी रिपोर्टिंग नही देखी जिससे लगता हो कि ये पत्रकार हैं या कभी रही हैं। हाँ उदय प्रकाश की एक कहानी में किसी मृणाल का जिक्र आता है जो दिनमान या सारिका में “अचार कैसे डाले” जैसे लेख लिखती है। कुल बात यह कि मृणाल या दूसरे ऐसी पात्रता नही रखते कि वो किसी की नौकरी खा जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिल जी, हम लोग कथादेश में तथा अन्य जगहों पर आपके लेख पढ़ते हुए बड़े हुए हैं। आपसे बहुत कुछ सीखा है। आप एक दफा भी यह बात अपने मन में ना लाना कि आपसे कोई चूक हो गई। आप इस तुगलकी फरमान के खिलाफ लड़ाई जारी रखिये। अपने सीमित संसाधनों के बावजूद आप इस लड़ाई में चापलूसों की फौज के सारे तर्क ध्वस्त कर देंगे और ताकतवर जुगाड़ियों को परास्त करेंगे, इस बात का भरोसा है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;चन्द्रिका&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;मीडिया&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;मेल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;प्राप्त&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-6361504809759330331?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/6361504809759330331/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_29.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6361504809759330331'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6361504809759330331'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_29.html' title='एक सही नियुक्ति को भी खा गये विभूति नरायन राय- युवा कथाकार चन्दन पान्डेय'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S2OvgJb4p1I/AAAAAAAAACo/VQneCiRKFNc/s72-c/chandan-pandey.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-6590956151375478720</id><published>2010-01-26T21:11:00.000-08:00</published><updated>2010-01-26T21:19:12.206-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तानाशाही'/><title type='text'>कथाकारों, सामंतवाद के गढ़ में आपका स्वागत है.</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S1_Lx4P6cnI/AAAAAAAAACg/7CGjCXTg3f4/s1600-h/s_pages.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431283733405266546" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 127px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S1_Lx4P6cnI/AAAAAAAAACg/7CGjCXTg3f4/s320/s_pages.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; प्रो. असगर वजहात, संजीव, चित्रा मुदगल, वीरेन्द्र यादव, अब्दुल बिस्मिल्लाह, गंगाप्रसाद विमल, हरि भटनागर, अजय नावरिया, भगवान दास मोरवाल, एस.आर. हरनोट, वंदना राग, महुआ माझी, राजेन्द्र राजन, गीत चतुर्वेदी, मनोज रूपड़ा, पंकज मित्र, मो. आरिफ, तेजेन्द्र शर्मा, मृदुला शुक्ला, वीरेन्द्र मोहन, मीनाक्षी जोशी, बसंत त्रिपाठी, प्रमोद कुमार तिवारी, सूरज प्रकाश, अजीत राय, आशा पाण्डेय, विरेन्द्र मोहन, से.रा. यात्री, आप सब को हिन्दी विश्वविद्यालय के कथा समय में आमंत्रित किया गया है. हिन्दी कथा साहित्य की दो दशकों कॊ यात्रा में यदि सबसे अच्छे कथाकार और उपन्यासकार विभूतिनरायण राय हैं तो, तो बेरोजगारी की स्थिति में यह एक पंक्ति किसी भी बेरोजगार आगंतुक को रोजगार दे सकती है और यहाँ वैकेंसी नहीं निकलती, आदमी निकल आया काम का, तो बैकेंसी बन जाती है. तो हे भद्रजनों, कथाकारों हम आपका स्वागत करते हैं कि “जिन पंचटीला नईं देख्या ओ न भया कथाकार”.&lt;br /&gt;पिछले दिनों हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रशासन द्वारा की जा रही तानाशाही और सवर्णवादी रूप आपको अखबारों और ब्लागों के माध्यम से शायद पता चला ही हो जिस पर विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने लिखा था. विभूतिनरायण राय ने शायद उन छात्रों को बुलाकर बात-चीत करने का प्रयास भी किया था, महोदय यहाँ छात्रों को दलाल बनाने की यही प्रक्रिया है. खैर, यह कथा का समय है अक्सर कई पाप करने के बाद ब्रहमणों की व सवर्णों की यह आदत होती है कि वे कथा सुन लेते हैं और पाप से मुक्त हो जाते हैं. राय साब यानि दरोगा जी ने अपने थाने में कथा रखी है और आप जैसे पंडितों को आमन्त्रित किया है ताकि उन्हें कई कुकर्मो के बाद एक सुकर्म करके थोड़ा मुक्ति का एहसास हो. इस तरह की कथा वे अक्सर विश्वविद्यालय में करवाते रहते हैं जिनके विषय से आपको लगेगा कि क्रांति अब हुई की तब और कई बार माईक पर क्रांति करते भी हैं अक्सर छद्म प्रगतिशील यही करते हैं. यह उनका पी.आर.ओ. प्रोग्राम है जिसमे वे साहित्यिक बुद्धिजीवियों के बीच अपनी साख मजबूत करते हैं. तो भद्रजनों सामंतवाद के गढ़ में हम आपका स्वागत करते हैं. आप सब कहानी के कुछ बीज तलासियेगा आपको उगे उगाये पौधे मिल जायेंगे, कहानी के पेड़ मिल जायेंगे, उपन्यासों के लहलहाते खेत मिल जायेंगे. इस पथरीली जमीन में कथा की उर्बरा शक्ति बहुत है, उनके तकले सिरों को झांकियेगा जिनके सिर में अब बाल नहीं बचे हैं बची है तो बस चमकती हुई खोपड़ी पर वहीं कहीं चमकती खोपड़ियों में होगा आपका पात्र. जो दिल तो बच्चा है थोड़ा कच्चा है अभी भी गाता रहता है. यहीं पर आपको मिलेंगे प्रख्यात चोर गुरू अनिल राय अंकित, पर अब ये टाई नहीं लगाते इसलिये गुमराह मत होइयेगा और ये चोर जैसे नहीं मीडिया विभाग के हेड जैसे दिखते हैं. अगर हो सके तो इन्हें बधाई दे दीजियेगा क्योंकि आभी हाल में ही इनकी नियुक्ति को इ.सी. द्वारा मान्य करवाया जा चुका है अब इनकी चोरी ही इनकी दादागीर बन गयी है कारण कि अनिल अंकित “राय” और विभूतिनरायण “राय” आप समझ गये होंगे, ये जाति बड़ी इफेक्टिब चीज होती है और अगर रिश्तेदारी भी हो तो क्या कहने. यहाँ भी कुछ ऐसा ही मामला है साब.&lt;br /&gt;दरोगा साब हर रोज इनकाउंटर के मूड में रहते हैं कभी किसी दलित छात्र का तो कभी किसी अध्यापक का आप आयेंगे तो पता चलेगा कि हाल में कौन-कौन शिकार हुआ है. इस इनकाउंटर को कहानी की भाषा में समझिये यह इलाहाबाद वाला इनकाऊंटर नहीं है. दलित अध्यापक कारुन्यकरा को रोज एक नोटिस मिलती है उनसे आप मिलियेगा तो पूछियेगा कि ब्रह्मणवाद मुर्दावाद गाली किसके लिये है. विश्वविद्यालय का हर अध्यापक इस तानाशाही पर अंदर-अंदर सुगबुगाता है पर पेट का सवाल है सो दरोगा साब से कुछ नहीं बोलता.&lt;br /&gt;और थोड़ा धीरे से कान लगाकर सुनिये ये जो आपका स्वागत करने के लिये पालीवाल जी हैं इन्होंने पिछले दिनों किसी महिला कर्मचारी के साथ छेड़खानी की थी और और पता चला कि नाड़ी और धड़कन पर बात करते-करते कुछ प्रेक्टिकल...............अब ज्याने दीजिये, बुजुर्ग हैं ६० साल के पर ऐसा ही कुछ कई दिनों तक विश्वविद्यालय में गूंजता रहा. आप जब इनसे हाथ मिलाइये तो जरा बच के रहिये और आप किस कमरे में ठहरे हैं यह कतई मत बताईयेगा, सोते समय कुंडी बंद कर लीजियेगा और जब भी मिलियेगा दो-चार लोगों के साथ बस...हां ये इस बात से दुखी हैं कि स्नोवाबार्नों क्यों नहीं आ रही हैं. विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश जी बहुत नेक इंसान हैं अक्सर थानेदार साब को काबू में कर लेते हैं. एक दिन एक लड़्की को क्लास में बुलाकर बोले कि ये लड़की बिकनी पहने तो कैसी लगेगी यह आपको अटपटा लगा होगा पर महिलाओं के बारे में यहाँ की छात्राओं के बारे में आला अधिकारियों के विचार ऐसे ही हैं. प्राक्टर मनोज कुमार के किस्से किसी दिन इत्मिनान से बताऊंगा पर नये साल पर इन्होंने छात्र-छात्राओं को तोहफा दिया और पुरुष छात्रावास में छात्राओं के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया. शायद किसी छात्रा ने किसी छात्र को फटकारा था और सभी छात्राऒ पर प्रतिबंध। प्रतिबंधित करने का आदेश सामंत के मुंसी राय साब ने दिया. बाकी कहानिया आप यहाँ आ के ढूंढ़ियेगा. हमने अपने कैमरे से १३ जनवरी की शाम को कुछ दिलचस्प फोटो खींचे हैं जो आपको मुफ्त मिल जायेंगे और आप इन चेहरों को पहचानियेगा जबकि वे आपके इर्द गिर्द ही रहेंगे. हिन्दी विभाग के एक शिक्षक-शिक्षिका की कहानी.......व कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास की कई सारी काहानियां जो हर दो तीन घंटे में पुरानी हो जाती है, उपन्यास के कथानक सुबह-सुबह झाड़ू के साथ बुहार दिये जाते हैं ये सब आपको बताउंगा और तब तक बताऊंगा जब तक ये सुधरते नहीं, जबकि मैं जानता हूँ कि ये नहीं सुधरेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;वर्धा मेल से प्राप्त १३ तारीख की फोटो भी आप यहीं पर देखेंगे ऐसी मेल में सूचना  थी.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-6590956151375478720?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/6590956151375478720/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6590956151375478720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6590956151375478720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='कथाकारों, सामंतवाद के गढ़ में आपका स्वागत है.'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/S1_Lx4P6cnI/AAAAAAAAACg/7CGjCXTg3f4/s72-c/s_pages.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-8384022926779645617</id><published>2009-12-30T22:58:00.000-08:00</published><updated>2009-12-30T23:09:19.923-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तानाशाही'/><title type='text'>नये साल की चुनौतीपूर्ण बधाई</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5421293572714924114" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 417px; CURSOR: hand; HEIGHT: 127px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzxNx_jICFI/AAAAAAAAACY/-OuuzIe07Ko/s320/hindi+uni.jpg" border="0" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;साथियों,&lt;br /&gt;ईक्कीसवीं सदी के पहले दशक की समाप्ति की ओर ले जाने वाला यह साल बीत रहा है और हमारा विश्‍वविद्यालय एक मध्ययुगीन काल की तरफ़ लौट रहा है। हम लौट रहे हैं, राजशाही के फ़रमानों जैसे फ़रमान के अंधेरे युग की तरफ़, हमें उन मूल्यों की तरफ़ लौटने पर विवश किया जा रहा है, जिन्हें बीती हुई पीढ़ीयों ने मनुष्‍यता के हित में कुछ सौ साल पहले छोड़ दिया था. आपके छात्रावास तक वह “सूचना”, क्षमा करें, इसे फ़तवा ही कहा जाना चाहिये?, पहुंच चुका होगा जिसमें पुरूष छात्रावास में छात्राओं का प्रवेश निषेध किया जा चुका है.&lt;br /&gt;यह समय था बीते हुए साल के आंकने का, हिन्दी समाज और विश्वविद्यालय के निर्माण पर सोचने का, लेकिन यह सब कुछ नहीं हुआ…… साल बीतने के साथ जिस असमानता को कुछ और कम होना था, जिन मसलों को सुलझ जाना था, उसे एक मध्ययुगीन सामंत की मानसिकता के प्रॉक्टर द्वारा और बढ़ाये जाने का काम किया जा रहा है, जो सड़े-गले मूल्यों को थोप कर छात्र-छात्राओं पर शासन करने का प्रयास कर रहे हैं.&lt;br /&gt;अगले बरस के फ़रमान शायद छात्र-छात्राओं के अलग कक्षा में अध्ययन-अध्यापन के हों, फिर शायद, अगला बरस छात्र-छात्राओं के आपस में बात-चीत पर दंड का प्रावधान लेकर आए और उसके अगले बरस विश्वविद्यालय में छात्राओं के प्रवेश पर.... निषेध! तब शायद हमें आश्‍चर्य और अफ़सोस करने तक का मौक़ा न मिले। क्या तीन वर्ष बाद आप इस विश्‍वविद्यालय को ऐसा ही देखना चाहेंगे?&lt;br /&gt;हम उन छात्र-छात्राओं और विश्वविद्यालय के उन सभी सदस्यों, जो इस असमानता को कम करने की ख़्वाहिश रखते हैं, की तरफ़ से इस फ़तवे की तीखी निंदा करते हैं.&lt;br /&gt;विश्वविद्यालय के आलाअधिकारियों, जेंडर असमानता को कम करने की मुहिम में लगे प्रगतिशील अध्यापक-अध्यापिका एवं छात्र-छात्राएं नये वर्ष की बधाई के साथ इस मध्य-युगीन मूल्यों के फ़तवे की चुनौती को स्वीकार करें।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;दख़ल की दुनिया ब्लॉग&lt;br /&gt;www.dakhalkiduniya.blogspot.com&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;वर्धा मेल से प्राप्त&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-8384022926779645617?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/8384022926779645617/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/8384022926779645617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/8384022926779645617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html' title='नये साल की चुनौतीपूर्ण बधाई'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzxNx_jICFI/AAAAAAAAACY/-OuuzIe07Ko/s72-c/hindi+uni.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-7412657366547075916</id><published>2009-12-29T02:43:00.000-08:00</published><updated>2009-12-29T03:00:50.192-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>वि.वि. का आज १२ वाँ स्थापना दिवस</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#330033;"&gt;वि।वि। का आज १२ वाँ स्थापना दिवस है। जिसमे एक तरफ प्रशासन भव्य पंडाल लगाकर आड्म्बर पूर्ण आयोजन करवा रहा है वहीं २१ दिन से आंदोलन रत छात्र इस दिवस को शोक के रूप में मनाते हुए अपना मुंडन करा रहे हैं इतने दिनों से छात्रों द्वारा की जा रही जायज मांगों को प्रशासन इसलिये नहीं मांग रहा है कि उसकी प्रतिष्ठा दांव पर है ख्यात ब्रहम्हणवादी प्रो. आत्म प्रकाश श्रीवास्तव को बचाने के लिये विभूतिनरायण राय जैसे प्रगतिशीलता पसंद कुलपति न जाने क्यों जुटे हुए हैं.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#663333;"&gt;&lt;strong&gt;दिवस के शोक की कुछ तस्वीरें-&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420609948853672274" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngB2NfGVI/AAAAAAAAACQ/Mlxivk4KnJw/s400/100_2006.jpg" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngBQ8DLOI/AAAAAAAAACI/dJYcn_uGsRE/s1600-h/100_2001.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420609938848427234" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngBQ8DLOI/AAAAAAAAACI/dJYcn_uGsRE/s400/100_2001.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngBIzlXDI/AAAAAAAAACA/z6e7QffgVCg/s1600-h/100_2004.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420609936665435186" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngBIzlXDI/AAAAAAAAACA/z6e7QffgVCg/s400/100_2004.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngA1l42oI/AAAAAAAAAB4/bMaA8LXrFD0/s1600-h/100_2000.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420609931507718786" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngA1l42oI/AAAAAAAAAB4/bMaA8LXrFD0/s400/100_2000.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngAcG_m6I/AAAAAAAAABw/gbq1kI2loDE/s1600-h/100_1999.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420609924667251618" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngAcG_m6I/AAAAAAAAABw/gbq1kI2loDE/s400/100_1999.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-7412657366547075916?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/7412657366547075916/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_7957.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/7412657366547075916'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/7412657366547075916'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_7957.html' title='वि.वि. का आज १२ वाँ स्थापना दिवस'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzngB2NfGVI/AAAAAAAAACQ/Mlxivk4KnJw/s72-c/100_2006.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-6262808770418306438</id><published>2009-12-29T02:40:00.000-08:00</published><updated>2009-12-29T02:42:56.609-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>हिंदी के नाम पर ये कैसा समाज बना रहे हैं?</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#333399;"&gt;&lt;em&gt;अनिल&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में एक ओर आज जहां ’स्थापना दिवस’ मनाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर दलित विद्यार्थी पढ़ाई लिखाई पर अपने अधिकार को हासिल करने के लिए अनशन पर बैठे हैं। इन विद्यार्थियों ने इस दिन को ’शोक दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान किया है। पिछले नौ दिसंबर को दीक्षांत समारोह के बहिष्कार से लेकर आज यह दूसरा बड़ा आयोजन होगा, विद्यार्थियों द्वारा जिसके सामूहिक बहिष्कार की घोषणा की जा रही है। यहां इस पूरे आयोजन और इस ’स्थापना दिवस’ की ऐतिहासिकता पर एक नज़र डालना तर्कसंगत होगा।&lt;br /&gt;आज से ठीक तीन साल पहले, 29 दिसंबर 2006 को तत्कालीन कुलपति जी गोपीनाथन के कार्यकाल में अकादमिक धांधलियों के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन में लगभग चालीस छात्र-छात्राओं को जेल भेज दिया गया था। तत्कालीन प्रशासन की निरंकुशता और बेशर्मी का एक नमूना यह था कि स्थापना दिवस के उस आयोजन में मिठाइयां बांटते हुए आदोलनरत विद्यार्थियों के बारे में मंच से एक भद्दी टिप्पणी की गई थी जिसका आशय कुछ इस तरह था कि कुछ ’सनकी’ क़िस्म के लोग यह ’समारोह’ जेल में मना रहे होंगे।&lt;br /&gt;आज शाम, मंच से ऐसी बातें नहीं होंगी। हो भी नहीं सकतीं। लेकिन विश्‍वविद्यालय के वातावरण में आज भी अन्याय और भेदभाव को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित करने वाली स्थितियां मौजूद हैं। समाज में सत्ताधारी सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने वाली सभी ताक़तें एक भिन्न रूप और भिन्न तरीक़ों से सत्ता के पायदान पर आसीन हो गई हैं। उनमें से मात्र कुछेक ज़रूरी मसलों पर वर्तमान दलित छात्र-छात्राएं आंदोलनरत हैं, लेकिन वर्तमान प्रशासन नीतिगत स्तर पर इन सारे मुद्दों को ’नाजायज़’ और व्यक्‍तिगत स्तर पर अपनी ’प्रतिष्‍ठा’ का मुद्दा मान रहा है। उसने इन्हें नज़रअंदाज़ करने और इन मुद्दों को ’पचाने’ के नए और अपेक्षाकृत बेहतर तकनीकी ईजाद कर ली है। अब ’उपलब्धियों’ का बखान करने वाले अतिरंजित जनसंपर्क द्वारा लोगों को सरलता से मूर्ख बनाया जा सकता है। सांस्थानिक जनसंपर्क द्वारा सतही प्रचार करने के इस उपक्रम से वास्तविक मुद्दों को चट कर जाने में आसानी हो जाती है। स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता के तिकड़मों के कारण ऐसे हवाई दावों को चुनौती मिलनी भी मुश्किल हो रही है। साथ ही स्थानीय जनमानस के बीच ऐसी छवि गढ़ने की कोशिश की जाती है जैसे कि विश्‍वविद्यालय कोई ’असामान्य’ तथा हर तरह के सवालों से परे रहने वाला संस्थान हो। अब सक्रिय तथा गतिशील हिंदी समाज तो यहां की स्थितियों पर कोई रोज़मर्रा की निगरानी रख नहीं रहा है कि उसे इन सेकंड हैंड तथा आत्ममुग्ध विवरणों को आलोचनात्मक ढंग से परखने का मौक़ा मिले।&lt;br /&gt;वर्तमान कुलपति विभूति नारायण राय को विश्‍वविद्यालय में आए तेरह-चौदह महीने हो चुके हैं। उनके इस एक साल के कार्यकाल और कामों के बारे में अब कुछेक वस्तुपरक टिप्पणियां कदाचित की जा सकती हैं। दिलचस्प है कि इस दौरान विश्‍वविद्यालय के प्रति अवधारणा और विज़न के बारे में उनकी भाषा और शब्दावली में आश्‍चर्यजन ढंग से, ग़ौरतलब परिवर्तन आया है। कुलपति के रूप में अपने पहले वर्धा आगमन से लेकर अब तक उन्होंने हिंदी समाज और उसकी विसंगतियों, विश्‍वविद्यालय से समाज की अपेक्षाएं, प्रशासन के कामकाज आदि के बारे में कई बार बयान दिए हैं जो काफ़ी उलझाने वाले अंदाज़ (पोलेमिक स्टाइल) के जीते जागते नमूने हैं। यहां एक उदाहरण देना उचित होगा जिससे उनके अकादमिक विज़न के बारे में कुछ ठोस राय बनाई जा सकती है। इस स्थापना दिवस की पूर्वसंध्या पर उन्होंने कहा, “हिंदी को मात्र साहित्य या चिंतन की भाषा नहीं बनानी है, इसे वैश्‍विक स्तर पर एक भाषिक राजदूत की भूमिका निभानी है।” ज़ाहिर है, ऐसा उन्होंने हिंदी विश्‍वविद्यालय की भूमिका के संदर्भ में कहा है। साल भर पहले, कुलपति का कार्यभार ग्रहण करते वक़्त उन्होंने कबीर को याद करते हुए कहा था कि हिंदी विश्‍वविद्यालय को हिंदी समाज में नवजागरण के अग्रदूत की भूमिका निभानी होगी। यहां हिंदी भाषी समाज में हिंदी के प्रगतिशील चिंतन पक्ष के प्रति एक ज़ोर था। लेकिन साल भर में शब्दावली ख़ामोश तरीक़े से बदल गई। और अब कई पदासीन लोगों को ऐसे प्रसंगों को याद करना बाल में खाल निकालने जैसा लगने लगता है।&lt;br /&gt;यह एक सुपरिचित तथ्य है कि देश के भीतर हिंदी के प्रचारात्मक ’राजदूत’ की भूमिका के लिए कई हिंदी प्रचार समितियां सालों से चल रही हैं। इनके ज़िम्मे प्राथमिक काम हिंदी समाज के हिंदी के कर्मकांडी सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थापित करते हुए उन्हें वैध ठहराने से लेकर, सड़े गले परंपरावादी विचारों के पुनरोत्पादन तक का है। एक पतित नौकरशाही मशीनरी ने इनका धंधा और आसान कर दिया है। अब हिंदी विश्‍वविद्यालय भी इस पटाखा तैयारी में व्यस्त है कि वह इसी लीक का अनुसरण करते हुए, विश्‍वविद्यालय की बौद्धिक सरगर्मीयुक्‍त ज़िम्मेदारी से अपने आप को घटाकर (रिड्यूज़ कर) अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर ऐसे ही प्रचारात्मक ’राजदूत’ की भूमिका का निर्वहन करेगा। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि भूतपूर्व दो कुलपतियों का कार्यकाल ऐसी ही समझदारियों से संचालित कार्यपद्धतियों की असफलता का दौर रहा है। इन्हीं विचारों की उपज में उस अकादमिक भ्रष्‍टाचार के उत्स हैं जिसने स्थितियों को और दयनीय बना दिया।&lt;br /&gt;पिछले एक साल में, भवन आदि के निर्माण में अपेक्षाकृत तेज़ी आई है। ढांचागत निर्माण के जो काम पिछले कई सालों से प्रशासनिक इच्छा की कमी के कारण स्थगित पड़े रहे उनकी शुरुआत हो गई है। लेकिन अकादमिक तौर पर कोई भेदभावरहित व्यवस्था अब तक नहीं बन पाई है। न ही अकादमिक गुणवत्ता को बनाने का कोई पैमाना और आदर्श निर्मित किया गया है। इस बीच, कई बड़े, महत्त्वाकांक्षी जनसंपर्क समारोह आयोजित किए गए। इनमें हिंदी समाज के कई लेखक, कवि तथा आलोचकों ने अभिनंदनयुक्‍त भागीदारी की। आंशिक तौर पर लोगों की प्रदर्शनयुक्‍त भागीदारी सुनिश्‍चित हुई जिसके माध्यम से हिंदी के दूर-दूर तक पसरे साहित्यिक समाज को लुभावना संदेश दे दिया गया कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। और, भेदभाव के पुराने ढांचे क़ायम रहे। बस, औज़ार बदल गए। भाषा बदल गई, उसके स्वरूप में आंशिक हेरफेर किया गए लेकिन वर्चस्व के प्रतिमान नहीं बदले। अनुष्‍ठानिक गुणगान जारी रहे बस, उसकी पद्धतियां बदल गईं।&lt;br /&gt;सत्ता के नीचे के पायदानों पर ऐसे कई लोग हैं जिनका व्यवहार प्रमाणिक रूप से जातिवादी हैं। जो अपने अधिष्‍ठाता, विभागाध्यक्ष या पदाधिकारी होने के रसूख का इस्तेमाल अपने भ्रष्‍ट आचरण को मूंदने-ढांपने के लिए करते हैं। साफ़ साफ़ असहमति व्यक्‍त करने वाले छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और ग़ैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को मानसिक तौर पर उत्पीड़ित करते हैं। अब बात बात पर भयाक्रांत करने वाली नौकरशाही घुड़कियों का एक ऐसा मज़बूत घेरा निर्मित हुआ है कि अधिकतर लोग चुपचाप प्रशासन से सुविधाजनक नज़दीकी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझने लगे हैं। आम छात्र-छात्राओं के बीच यह यह बात सौ फ़ीसदी प्रमाणित हो गई है कि विश्‍वविद्यालय में उन्हीं विद्यार्थियों को तरक़्क़ी या ’नियुक्‍ति’ मिलती है जो हां में हां मिलाते हुए ’फ़ील गुड’ मुद्रा में रहते हैं। अकादमिक कौंसिल में छात्र-छात्रा प्रतिनिधियों के नाम पर हुई हालिया नियुक्‍ति इसका सर्वाधिक ज्वलंत उदाहरण है जहां मनमाने ढंग से यह नियुक्‍तियां संपन्न कर ली गईं। सौ से अधिक छात्र छात्राओं के विरोध पत्र के बावजूद अब तक कोई उचित कारवाई नहीं की गई है। अंततः आंदोलन का रास्ता अख़्तियार करने वाले छात्र राहुल कांबले को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। आज नागपुर तथा वर्धा के स्थानीय मीडिया में जो ख़बरें छपी हैं उनमें लफ़्फ़ाज़ियों तथा स्तुतिगान का एक नपा तुला मिश्रण मौजूद है।&lt;br /&gt;यह एक दारूण दृश्‍य है कि आज जनसंपर्क के मुखौटे और पाखंड के घटाघोप के बीच अपनी न्यायपूर्ण मांगों के लिए विश्‍वविद्यालय में छात्र-छात्राओं का एक बड़ा समूह ’स्थापना दिवस’ को एक ’शोक दिवस’ के रूप में मना रहा है। तीन सौ नियमित विद्यार्थियों वाले हिंदी विश्‍वविद्यालय में कुछ छात्र पिछले बीस पच्चीस दिनों से भूखे बैठे हैं और ऐसे अनुष्‍ठान पूरे घमंड के साथ जारी हैं। ऐसे में तीन साल पुराने स्थापना दिवस समारोह की यादें ताज़ी हो जाना स्वाभाविक है, जब उस समय की संख्या के लिहाज़ से एक तिहाई छात्र-छात्राएं जेल में हों और अपनी क्रूरता को सामान्य बनाने (नॉर्मलाइज़ करने) के लिए विश्‍वविद्यालय प्रशासन मिठाइयां बांट रहा था।&lt;br /&gt;क्या अब हिंदी के सक्रिय और चिंतित बुद्धिजीवियों को यह सवाल नहीं करना चाहिए कि हिंदी के नाम पर आख़िर यह कैसा समाज रचने की बुनियाद निर्मित की जा रही है?&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-6262808770418306438?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/6262808770418306438/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6262808770418306438'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6262808770418306438'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html' title='हिंदी के नाम पर ये कैसा समाज बना रहे हैं?'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-5160334195259034574</id><published>2009-12-23T03:19:00.000-08:00</published><updated>2009-12-23T03:23:38.502-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि प्रशासन के ख़‍िलाफ़ दलित चार्जशीट</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzH9PLSy92I/AAAAAAAAABo/YKFWkbkLB-g/s1600-h/100_4401.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5418390263874910050" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzH9PLSy92I/AAAAAAAAABo/YKFWkbkLB-g/s320/100_4401.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; देश भर में धर्मनिरपेक्ष प्रशासक की छवि निर्मित करने वाले पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति बनने के बाद दलितों का उत्पीड़न तेजी के साथ बढ़ा है। सवाल उठता है कि क्या कोई धर्मनिरपेक्षवादी जातिवादी नहीं हो सकता है? वर्धा विश्‍वविद्यालय में विभूति बाबू के आने के बाद दलित उत्पीड़न की घटनाएं एक नयी बहस खड़ी करती है। पेश है, सभी मामलों का सिलसिलेवार ब्‍यौरा…&lt;br /&gt;मामला नंबर एक )) विश्वविद्यालय के अनुवाद विद्यापीठ में राहुल कांबले ने एमफिल की परीक्षा में टॉप (स्वर्ण पदक) किया लेकिन पीएचडी में उसका नामांकन नहीं किया गया। अनुवाद विद्यापीठ में दो विद्यार्थियों का ही नामांकन करने का फैसला विश्वविद्यालय ने किया। पीएचडी के लिए चयनित विद्यार्थियों में राहुल कांबले को तीसरे नंबर पर दिखाया गया। लेकिन जब चयनित दो विद्यार्थियों में से एक विद्यार्थी ने अनुवाद विद्यापीठ में पीएचडी में नामांकन नहीं लिया, तो राहुल ने अपना दावा पेश किया। लेकिन लगातार तीन महीने तक उसे प्रताड़ित किया गया। उसने नामांकन की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए सूचना के अधिकार के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन से जानकारी मांगी थी। अनुवाद विद्यापीठ के डीन प्रो आत्मप्रकाश श्रीवास्तव ने सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करने की आड़ लेकर राहुल का नामांकन लेने से मना कर दिया। राहुल कुलपति विभूति नारायण राय के समक्ष अपनी फरियाद लेकर गया। लेकिन कुलपति ने बजाय उसके साथ न्याय करने के प्रो आत्मप्रकाश श्रीवास्तव से माफी मांगने का निर्देश दिया। राहुल ने प्रो आत्मप्रकाश श्रीवास्तव से चार बार माफी मांगी। उनके पैर तक पकड़े। लेकिन कुलपति ने नामांकन की स्वीकृति नहीं दी। आखिरकार राहुल ने आंदोलन करने की चेतावनी दी। आंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने राहुल के मामले को उठाया। 8 दिसंबर को विश्वविद्यालय ने दीक्षांत समारोह का आयोजन किया था। दलित छात्रों ने उसका बहिष्कार किया। दलित छात्रों का बड़ा हिस्सा दीक्षांत समारोह में दिये जाने वाले पदकों को लेने नहीं गया। उसी दिन राहुल कांबले आमरण अनशन पर भी बैठ गया। उसके बाद उसके समर्थन में कई दलित छात्र क्रमवार अनशन पर बैठने लगे। जबकि दीक्षांत समारोह में शामिल होने के लिए आये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डा सुखदेव थोराट ने अनशन कर रहे विद्यार्थियों के पास जाकर उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की। लेकिन डा थोराट के कहने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन राहुल का नामांकन लेने को तैयार नहीं हुआ। विद्यार्थियों ने कुलाधिपति नामवर सिंह से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि दलितों का जितना नामांकन गांधी के विश्वविद्यालय में होता है, उतना आंबेडकर विश्वविद्यालयों में भी नहीं होता होगा। डा नामवर सिंह से विद्यार्थियों ने अनशन स्थल पर आने का अनुरोध किया लेकिन दो दिनों तक अनशन स्थल से सौ कदम की दूरी पर रहने के बावजूद वे अनशनकारी विद्यार्थियों से मिलने नहीं गये। कुलपति लगातार कई दिनों तक अनशन स्थल के बगल से ही सुबह टहलने के लिए निकलते रहे, लेकिन उन्होंने विद्यार्थियों से मिलने व बातचीत करने की ज़रूरत नहीं महसूस की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी छह माह और छह वर्ष तक भी आंदोलन करेंगे तो उनका नामांकन नहीं हो सकता है। प्रति कुलपति मानवशास्त्री डा नदीम हसनैन को यह दुख हुआ कि विद्यार्थियों के अनशन की वजह से उन्हें सुबह टहलने का अपना रास्ता बदलना पड़ा। ट्रेड यूनियन आंदोलन की पृष्‍ठभूमि वाले विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश (श्रीवास्तव) ने कहा कि वर्धा जले या महाराष्ट्र या हिंदुस्तान, राहुल का नामांकन नहीं किया जाएगा। दलित विद्यार्थी लगातार संघर्ष करते रहे।&lt;br /&gt;मामला नंबर दो )) पिछले सत्र में विभूति नारायण राय के कार्यभार संभालने के बाद विश्वविद्यालय में जेआरएफ पाने वाले पहले छात्र संतोष बघेल को तुलनात्मक साहित्य में पीएचडी में नामांकन देने से मना कर दिया गया। संतोष विश्वविद्यालय में पदक प्राप्त मेधावी छात्र रहा है। नामांकन नहीं किये जाने की स्थिति में संतोष बघेल को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा। दलित विद्यार्थियों ने जिला प्रशासन के सामने जाकर अनशन किया। लेकिन अनशन के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन का एक भी प्रतिनिधि उनसे मिलने नहीं गया। तब विश्वविद्यालय परिसर में संगठन बनाना और आंदोलन करना भी संभव नहीं था। पुलिस कुलपति का एक भय पूरे वातावरण में व्याप्त रहता था। बाद में उन विद्यार्थियों ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग समेत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष गुहार लगायी और बताया कि पिछले तीन वर्षों से आरक्षण नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है।&lt;br /&gt;मामला नंबर तीन )) साहित्य में पहले पीएचडी में यदि दलित छात्रों के नामांकन हुए तो उन्हें किसी दलित शिक्षक के तहत ही शोध कराने की अघोषित व्यवस्था हनुमान प्रसाद शुक्ला के समय में रही है।&lt;br /&gt;मामला नंबर चार )) 2009 में जनसंचार विभाग में पीएचडी में प्रवेश परीक्षा हुई और उसके बाद इंटरव्यू किये गये। जिस पैनल ने ये प्रक्रिया पूरी की, उसमें संस्कृति विद्यापीठ के डीन, विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, एक रीडर, एक विशेषज्ञ और अनुसूचित जाति एवं जनजाति की बतौर प्रतिनिधि एक रीडर थी। उस समय दस विद्यार्थियों को पीएचडी में लेना था। जब परीक्षा परिणाम आया तो उसमें पिछड़े, दलित विद्यार्थियों की तादाद ज़्यादा थी। वे आरक्षण की सीट से ज़्यादा सामान्य वर्ग के रूप में भी सफल घोषित किये गये। तब दस सीटों के लिए नामांकन करने की घोषणा की गयी थी। लेकिन वो परीक्षा परिणाम रद्द कर दिया गया। दोबारा परीक्षा आयोजित की गयी। दोबारा परीक्षा की प्रक्रिया किस तरह से पूरी की गयी, गौरतलब है। विश्वविद्यालय से बाहर के एक शिक्षक ने ही प्रश्‍नपत्र तैयार किया। परीक्षा की कॉपी जांची और वहीं इंटरव्यू में बैठा। इस बार अनुसूचित जाति एवं जनजाति का प्रतिनिधि पैनल में नहीं था। परीक्षा परिणाम तीन दिनों की प्रक्रिया में ही निकाल दिया गया। इस परीक्षा परिणाम में ज़्यादा सवर्ण विद्यार्थियों को चयनित किया गया। मज़े की बात कि इस पैनल में विभाग के एक भी शिक्षक को नहीं रखा गया। सीटों की संख्या भी दस से तेरह कर दी गयी।&lt;br /&gt;मामला नंबर पांच )) दिसंबर 6, 2009 को आंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर मोमबत्ती यात्रा का कार्यक्रम आयोजित किया। यात्रा विश्वविद्यालय परिसर से होकर वर्धा स्थित आंबेडकर प्रतिमा तक गयी। इसमें दलित विद्यार्थियों के अलावा अन्य विद्यार्थी शामिल हुए। लेकिन पहली बात तो ये हुई कि इस यात्रा में विश्वविद्यालय के एक मात्र दलित प्रोफेसर लेल्ला कारुण्यकारा भी शामिल हुए तो उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। आरोप लगाया गया कि उन्होंने जातीय नारे लगाये। नारे थे – ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, मनुवाद मुर्दाबाद, जातिवाद मुर्दाबाद आदि। प्रोफेसर कारुण्यकारा को दिये गये नोटिस में कहा गया कि उन्होंने परिसर का वातावरण दूषित किया। उन्हें सात दिनों के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया। ये भी चेतावनी दी गयी कि यदि सात दिनों के भीतर जवाब नहीं दिया गया तो एकतरफा कार्रवाई कर ली जाएगी। ये नोटिस खुद विभूति नारायण राय ने जारी किया। दूसरी बात कि उसी दिन विश्वविद्यालय ने भारत-ईरान कलाओं के लोक आख्यान पर कार्यक्रम आयोजित किया। वह रविवार का दिन था। तीसरी बात कि शाम को लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा के लिए विश्वविद्यालय के गांधी हिल्स पर एक अलग कार्यक्रम आयोजित किया गया।&lt;br /&gt;मामला नंबर छह )) दिसंबर 6, 2008 को बाबासाहेब आंबेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र ने महापरिनिर्वाण दिवस मनाने का फैसला किया था। कार्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन से तीन हजार रुपये की मांग की गयी थी। लेकिन दो हजार रुपये ही स्वीकृत किये गये और उसी दिन पुस्तकालय में इससे अलग कविता पाठ का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका असर ये हुआ कि 6 दिसंबर 2009 को दलित जनजाति अध्ययन केंद्र ने कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया।&lt;br /&gt;मामला नंबर सात )) दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र की बिल्डिंग के शिलान्यास पत्थर को गिरा दिया गया। इसका शिलान्यास विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोराट ने 22 फरवरी 2007 को किया था। इसका दोबारा शिलान्यास कराने की योजना बनी और राज्यपाल आरएस गवई को 2 दिसंबर 2009 को आमंत्रित किया गया। लेकिन वो नहीं आये। आज भी वो शिलान्यास पत्थर कूड़े के ढेर के समान पड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;मामला नंबर आठ )) डा आंबेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र के भवन के निर्माण के लिए एक करोड़ रुपये मिले थे। लेकिन उसका इस्तेमाल दूसरी बिल्डिंग बनाने में कर दिया गया।&lt;br /&gt;मामला नंबर नौ )) कुलपति विभूति नारायण राय ने कार्यभार संभालने के बाद तीन शिक्षकों को चार कारण बताओ नोटिस जारी किया और वे सभी शिक्षक दलित एवं आदिवासी हैं।&lt;br /&gt;मामला नंबर दस )) कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने कार्यकाल में एक वर्ष के अंदर पचास से ज़्यादा अस्थायी बहालियां की, उनमें एक भी दलित एवं आदिवासी नहीं है।&lt;br /&gt;मामला नंबर ग्‍यारह )) दलित छात्र-छात्राओं के खिलाफ जातिगत पूर्वाग्रहों को कई बार घटनाओं के रूप में सामने रखना संभव नहीं हो पाता है। ऐसी न जाने कितनी बातें हैं, जो केवल दलित महसूस करता है कि उसके साथ जातिगत भेदभाव किया जा रहा है।&lt;br /&gt;मामला नंबर बारह )) दलित विद्यार्थियों का आठ महीने तक राजीव गांधी फेलोशिप रोके रखा गया।&lt;br /&gt;मामला नंबर तेरह )) कुलपति ने विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के दलित नेताओं को लंपट कहा।&lt;br /&gt;मामला नंबर चौदह )) कुलपति ये कहते हैं कि दलित इस विश्वविद्यालय में केवल फैलोशिप के लिए आते हैं।&lt;br /&gt;मामला नंबर पंद्रह )) सहायक रजिस्ट्रार (वित्त) सुशील पखिडे वित्त के एकमात्र स्थायी अधिकारी हैं, लेकिन उन्हें वित्त से हटा दिया गया और डिस्‍टेंस (दूरस्थ शिक्षा विभाग) में भेज दिया गया।&lt;br /&gt;मामला नंबर सोलह )) आयुष छात्रावास के छात्र के रूप में अमरेंद्र शर्मा के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज है। उन्हें आयुष छात्रावास का ही वार्डेन बना दिया गया। जब विद्यार्थियों ने विरोध किया तो दूसरे छात्रावास का वार्डेन बना दिया गया।&lt;br /&gt;मामला नंबर सत्रह )) विश्वविद्यालय में किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया गया है, लेकिन दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र के तीन विद्यार्थियों को फेल कर दिया गया।&lt;br /&gt;एक तरफ तो दलितों के उत्पीड़न की ऐसी शिकायतें हैं, तो दूसरी तरफ जातिवाद के कुछ और नमूने भी देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;नमूना नंबर एक »» विश्वविद्यालय के शांति एवं अहिंसा विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर मनोज राय को दिल्ली सेंटर का प्रभारी बनाया गया। नियमत: ये गलत है। इन महोदय को वेतन वर्धा में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए दिया जाता है, लेकिन ये महोदय कक्षा नहीं लेते हैं, बल्कि उन्हें दिल्ली में मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की डीलिंग के काम में लगाया गया है। तीसरी बात कि कुलपति स्‍वयं को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, लेकिन मनोज राय घोषित तौर पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े रहे हैं। मनोज राय ने सूचना के अधिकार के तहत बतौर सूचना अधिकारी सूचना लेने की फीस दस रुपये से बढ़ा कर नियमों के विपरीत पचास रुपये कर दिया था। चूंकि वे स्वजातीय हैं, इसीलिए उनके लिए सब क्षम्य है और वे ईनाम पाने के हर तरह से हकदार हैं।&lt;br /&gt;नमूना नंबर दो »» विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग का प्रमुख डा अनिल कुमार राय अंकित को बनाया गया है। वे दक्षिणपंथी विचारों के हैं। उनके नाम से छपी दर्जनों किताबों के बारे में पूरे देश में ये छपा है और चैनलों में दिखाया गया है कि उन्होंने अपनी किताबें दूसरे लेखकों की किताबों से सामग्री लेकर छापी है। उन्हें चोर गुरु के रूप में सभी जानते हैं। कुलपति को भी ये सब पता है। उनके यहां बाकायदा शिक़ायत दर्ज करायी गयी है। ये सब तथ्य डा अंकित की नियुक्ति के समय भी उनके सामने मौजूद थे। लेकिन ये उनके स्वजातीय हैं, इसीलिए उनके ख़‍िलाफ़ कोई कार्रवाई करने के बजाय दीक्षांत समारोह के लिए उन्हें हजारों का बजट देकर मीडिया प्रभारी बना दिया गया।&lt;br /&gt;जातिवादी कौन है?&lt;br /&gt;आप इसे दुनिया को बताएं। धर्मनिरपेक्षतावादी की छवि बनाकर जातिवाद को कैसे सुरक्षित रखा जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-5160334195259034574?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/5160334195259034574/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/5160334195259034574'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/5160334195259034574'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html' title='अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि प्रशासन के ख़‍िलाफ़ दलित चार्जशीट'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SzH9PLSy92I/AAAAAAAAABo/YKFWkbkLB-g/s72-c/100_4401.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-422846517524958849</id><published>2009-12-18T03:24:00.000-08:00</published><updated>2009-12-18T03:31:03.330-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया विभाग'/><title type='text'>मसला-ए-"चोर गुरू"</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmuZtQvvI/AAAAAAAAABg/Ym93D6mk9s0/s1600-h/ramesh+pathak.JPG"&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:#003300;"&gt;साथियों,&lt;br /&gt; पिछले दिनों सी.एन.इ.बी. न्यूज चैनल पर अपने विश्ववविद्यालय के मीडिया विभाग के प्रमुख अनिल राय अंकित पर एक कार्यक्रम "चोर गुरू" दिखाया गया जिसमे कहा गया कि उन्होंने चोरी करके एक साल में बारह पुस्तकें लिखी हैं. बाद में उपलब्ध होने पर यह कार्यक्रम हम छात्र-छात्राओं द्वारा भी देखा गया क्योंकि यह हमारे विभाग का मामला था और हमारे भविष्य को प्रभावित करने वाला भी लिहाज़ा हमने इसे देखा भी और आपस में इस विषय पर बात-चीत भी की पर हमारे कुछ छात्र मित्रों द्वारा हमारा इस फिल्म को देखना विश्वविद्यालय विरोधी लगा और उन्होंने सुनियोजित ढंग से एक विद्यार्थी के खिलाफ़ प्रशासन को पत्र लिखा या उनसे लिखवाया गया जिसे हम यहाँ सार्वजनिक कर रहे हैं. &lt;br /&gt;अगर आप उस कार्यक्रम को देखना चाहते हैं तो &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="mailto:mgahvreporter@gmail.com"&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:#003300;"&gt;mgahvreporter@gmail.com&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmuZtQvvI/AAAAAAAAABg/Ym93D6mk9s0/s1600-h/ramesh+pathak.JPG"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt; पर सम्पर्क करके प्राप्त कर सकते हैं ताकि इस पर सार्वजनिक बहस की जा सके कि विश्वविद्यालय में व्याप्त गड़बडियों पर बात-चीत करना कितना विश्वविद्यालय विरोधी है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5416535924203896562" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 277px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmuZtQvvI/AAAAAAAAABg/Ym93D6mk9s0/s400/ramesh+pathak.JPG" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmuKiv9-I/AAAAAAAAABY/oAlBpXjZPPs/s1600-h/santosh+mannu.jpg"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5416535920133273570" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 348px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmuKiv9-I/AAAAAAAAABY/oAlBpXjZPPs/s400/santosh+mannu.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmtsvP1iI/AAAAAAAAABQ/NAis_bqdAV4/s1600-h/sandeep+vivek.jpg"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5416535912132630050" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 302px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmtsvP1iI/AAAAAAAAABQ/NAis_bqdAV4/s400/sandeep+vivek.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-422846517524958849?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/422846517524958849/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_18.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/422846517524958849'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/422846517524958849'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_18.html' title='मसला-ए-&quot;चोर गुरू&quot;'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/SytmuZtQvvI/AAAAAAAAABg/Ym93D6mk9s0/s72-c/ramesh+pathak.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-7452415916066348202</id><published>2009-12-16T02:00:00.000-08:00</published><updated>2009-12-16T02:08:53.074-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>छलित छात्रों का अनशन आठवे दिन भी जारी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Syixc5FeolI/AAAAAAAAABI/uGh6QsmkNGc/s1600-h/rahul+kamble.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415773661831275090" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Syixc5FeolI/AAAAAAAAABI/uGh6QsmkNGc/s320/rahul+kamble.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span class=""&gt;महात्मा&lt;/span&gt; गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दलित छात्र राहुल काम्बले को पीएच.डी. में प्रवेश न दिए जाने और विभागाध्यक्ष द्धारा उत्पीड़ित किए जाने को लेकर अम्बेडकर स्टुडेंट्स फोरम द्वारा आज आठवे दिन भी अनशन जारी रहा। आमरण अनशन पर बैठे दो छात्र चार दिनों से गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती है। विश्वविद्यालय को ऐसी स्थिति छोड़कर कुलपति बाहर चले गए है।इस बीच फोरम ने आम छात्रों की एक सभा बुलाकर स्टुडेंट्स को-आॅर्डिनेशन कमेटी का गठन किया। इस सभा में उपस्थित छात्रों ने प्रशासन के रवैये के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव पारित किया और फोरम की मांगों को समर्थन जताया। इस कमिटी ने प्रति कुलपति से कई बार बातचीत कर न्यायपूर्ण हल की मांग की और राहुल काम्बले को प्रवेश के संदर्भ तथ्य और तर्क रखे। यद्यपि प्रति कुलपति के पास इन तर्को का कोई ठोस जवाब नही था। परंतु वे राहुल का प्रवेश लेने के लिए राजी नहीं हुए और बार-बार एक कमेटी बनाकर जांच करवाने को लेकर अड़िग रहे। प्रति कुलपति का कहना था कि अनशन को समाप्त करने के बाद ही यह कमेटी बनाई जाएगी। जबकि राहूल के ही मसले पर बनी पूर्व की ही एक कमेटी द्वारा दी गई संस्तुति को अब तक न तो लागू किया गया और न ही सार्वजनिक। इस बीच प्रशासन ने इस मामले को तब और उलझा दिया जब विवि के ही एक दलित लेक्चरर शैलेश कदम मरजी को राहुल के स्थान पर प्रवेश दिया तथा राहुल के प्रोफेसर पिता को वर्धा बुलाकर बरगलाने की कोशिश की। जिससे छात्रों में और असंतोष भड़क गया। आमरण अनशन पर बैठे दो छात्र राहुल काम्बले और ओमप्रकाश बैरागी का अस्पताल में इलाज चल रहा है। विवि के केंद्रिय पुस्तकालय के सामने चल रहे अनशन के आज आठवे दिन संतोष कुमार बघेल श्रृखंला अनशन पर बैठे थे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#000099;"&gt;दलित कांबले अस्‍पताल में, सवर्ण छात्राएं विवि में दाखिल&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;जब रोम जल रहा है, नीरो मिट्टी का तेल डाल रहा है। जहाँ धुंआ उठ रहा है वहाँ हवा कर रहा है। बची हुई नमी को सूखा कर रहा है और जलाने पर पूरा-पूरा आमादा है। इतिहास की घटना का मुहावरा पंचटीला की पहाड़ियों पर उतर रहा है। गांधी के नाम पर बने विश्वविद्यालय में गांधी का रास्ता चुक रहा है, दम तोड़ रहा है।&lt;br /&gt;कुछ ऐसी ही स्थिति है महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की जहाँ पिछले आठ दिनों से कुछ छात्र आमरण अनशन पर हैं। जिसमे दो छात्र राहुल काम्बले, ओम प्रकाश वैरागी अस्पताल में भर्ती कराये जा चुके हैं। इन अंदोलनकारी छात्रों की हालत गम्भीर है। इस बीच लाखों रूपये खर्च करके किया जाने वाला आडम्बरपूर्ण कार्यक्रम दीक्षांत समारोह खत्म हो चुका है और कुलपति विभूति नारायण राय इस स्थिति को ऐसा ही छोड़ विश्वविद्यालय से बाहर चले गये हैं।&lt;br /&gt;अनुवाद विद्यापीठ के प्रमुख प्रो। आत्मप्रकाश श्रीवास्तव द्वारा दलित छात्र राहुल काम्बले के उत्पीड़न व विभाग में प्रवेश न दिये जाने की वजह से शुरू हुए इस अनशन को वि.वि. प्रशासन स्थानीय अखबारों में झूठा आरोप बता कर ख़ारिज कर रहा है। जबकि वि.वि. में आत्म प्रकाश का जातिवादी रवैया पिछली कई घटनाओं के आधार पर उजागर हो चुका है। प्रशासन के उच्च अधिकारी इस मसले को सुलझाने के पक्ष में भी नहीं हैं क्योंकि वे इसे अपने प्रतिष्ठा का मसला मान रहे हैं। जबकि दूसरी तरफ एक दलित छात्र का उत्पीड़न उन्हें स्वाभाविक सा प्रतीत हो रहा है। शायद इनकी नज़र में दलितों की कोई प्रतिष्ठा नहीं होत। उच्च अधिकारियों में ज्यादातर लोग अपनेआप को प्रगतिशील कहलाना पसंद करते हैं और देश दुनिया में उन्हें इसी लिहाज़ से जाना भी जाता है, चाहे वह प्रतिकुलपति नदीम हसनैन हों या फिर कुलपति विभूतिनारायण राय। लेकिन क्या यह एक तरह का सवर्णवाद नहीं है जहाँ 3 माह से उत्पीड़ित होता कोई छात्र आमरण अनशन पर बैठे और आमरण अनशन के स्थगन के बिना उच्चाधिकारी किसी कार्यवाही पर राजी न हों। यह मसला वि.वि. के सवर्णवादी रुख को ही इंगित करता है जिसकी उम्मीद यहाँ के विद्यार्थी, शिक्षक और देश के दूसरे हिस्से के शुभचिंतक लोग बतौर कुलपति विभूति नारायण राय से नहीं करते। वि.वि. के ही भाषा प्रौद्योगिकी नामक विभाग में दो ऐसी छात्राओं का प्रवेश लिया जाता है जो साक्षात्कार में सम्मिलित नहीं थीं। उनका नाम गुंजन शर्मा और अर्चना शर्मा है। यह प्रवेश किस आधार पर किया जाता है? बकौल प्रतिकुलपति, “यह प्रवेश विभाग प्रमुख की नीयत के आधार पर हुआ है, उन्होंने चाहा और प्रवेश ले लिया गया।” इस चाहने के पीछे का क्या कारण था? क्या यह नहीं कि ये दोनों छात्रायें सवर्ण थी और विभाग प्रमुख महेन्द्र पाण्डेय भी सवर्ण। और……….नीयत बन गयी। दरअसल, प्रतिकुलपति द्वारा कहे इसी वाक्य को राहुल काम्बले भी कह रहे हैं कि नीयत की व्याख्या करके देखा जाय कि उसके विभागाध्यक्ष आत्मप्रकाश की नीयत उसके लिये क्यों ख़राब है पर प्रशासन इस पर राजी नहीं है। तो इस बात को क्यों न माना जाय कि दलित छात्रों के लिये प्रशासन की नीयत भी खराब है। आखिर किसी प्रशासन या व्यक्ति की निष्पक्षता और प्रगतिशीलता को मापने के क्या पैमाने होंगे। प्रगतिशीलता की मुहर या उसके व्यवहार? &lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-7452415916066348202?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/7452415916066348202/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/7452415916066348202'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/7452415916066348202'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html' title='छलित छात्रों का अनशन आठवे दिन भी जारी'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Syixc5FeolI/AAAAAAAAABI/uGh6QsmkNGc/s72-c/rahul+kamble.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-646527023384977301</id><published>2009-12-13T21:16:00.000-08:00</published><updated>2009-12-13T21:18:25.207-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>प्रतिकुलपति से हुई वार्ता का संक्षिप्त ब्यौरा</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;दिनांक: 13 दिसंबर, शाम आठ बजे&lt;br /&gt;साथियों!&lt;br /&gt;दिनांक 12 दिसंबर को हुई छात्र छात्राओं की आम बैठक के बाद निर्वाचित स्टूडेंट्स को-ऑर्डिनेशन कमेटी की ओर से इस पर्चे के माध्यम से छात्र राहुल कांबले के आंदोलन पर यह पहला सार्वजनिक संबोधन है। इस मसले पर समिति के साथ प्रशासन के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में प्रतिकुलपति से हुई बातचीत का संक्षेप में ब्यौरा हम देना चाहेंगे। दोनों दिनों की बातचीत हालांकि सद्‍भावनापूर्ण माहौल में हुई लेकिन प्रशासन की ओर से एक यह आग्रह बार बार सामने आ रहा था कि पहले यह आमरण अनशन ख़त्म किया जाए उसके बाद एक समिति बनाकर इस मसले की संपूर्ण समीक्षा की जाएगी। हमारे प्रतिनिधियों ने इस पूरे मामले पर अनुवाद विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो.आत्मप्रकाश श्रीवास्तव के जातिवादी रवैयों को खुलकर सामने रखा कि बिल्कुल प्रारंभ से ही प्रो.आत्म प्रकाश की नीयत ठीक नहीं थी और उन्होंने अपनी जातिवादी मानसिकता के ही कारण राहुल के पीएचडी प्रवेश को मामले को फंसाए रखा और बाद में विद्यार्थी के आंदोलनरत होने के बाद मामले को और अधिक उलझाने का पूरा प्रयास किया। यहां तक कि उन्होंने प्रशासन के अन्य ज़िम्मेदार अधिकारियों को ठीक ठीक तथ्यात्मक जानकारियां तक नहीं दी। कमेटी के प्रतिनिधियों ने विवि प्रशासन द्वारा इस न्यायपूर्ण आंदोलन के प्रति तिरस्कारपूर्ण, संवेदनहीन तथा डराने धमकाने वाले रवैये की भी आलोचना की।&lt;br /&gt;पहले दिन प्रतिकुलपति ने कहा था कि हालांकि वे पदेन तौर पर राहुल के प्रवेश के मसले पर कोई नीतिगत निर्णय लेने की अवस्था में नहीं हैं इसलिए कुलपति से चर्चा के उपरांत ही वे कोई ठोस बात कहने की स्थिति में होंगे। फिर दूसरे दिन उन्होंने आमरण अनशन तोड़ने के आग्रह के साथ राहुल के प्रवेश के मसले सहित अन्य अकादमिक गड़बड़ियों को तथ्यात्मक तौर पर विस्तृत अध्ययन के लिए एक समिति बनाने का आश्‍वासन दिया। को-ऑर्डिनेशन समिति ने यह स्पष्‍ट किया कि आमरण अनशन के बारे में किसी तरह का निर्णय लेना इस समिति के दायरे में नहीं है लेकिन समिति अकादमिक माहौल को बहाल करने तथा इसे निरंतर उन्नत करने की ज़िम्मेदारी ज़रूर स्वीकारती है और इसके लिए हरसंभव योगदान देगी। इस बैठक में अकादमिक समिति में विद्यार्थी प्रतिनिधियों के "चयन" सहित अन्य अन्य अकादमिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट आम सभा की आगामी बैठक में प्रस्तुत की जाएगी।&lt;br /&gt;                       &lt;br /&gt;                        प्रकाशन विभाग&lt;br /&gt;                        स्टूडेंट्स को-ऑर्डिनेशन कमेटी&lt;br /&gt;                        म.गां.अं.हिं.वि. वर्धा&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-646527023384977301?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/646527023384977301/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_13.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/646527023384977301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/646527023384977301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_13.html' title='प्रतिकुलपति से हुई वार्ता का संक्षिप्त ब्यौरा'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-38592691662095553</id><published>2009-12-09T01:14:00.000-08:00</published><updated>2009-12-09T01:30:08.864-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>छात्रों का प्रतिरोध जारी</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9t_Px4vSI/AAAAAAAAABA/K1IOXrK986o/s1600-h/100_4401.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413166210457582882" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9t_Px4vSI/AAAAAAAAABA/K1IOXrK986o/s320/100_4401.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class=""&gt;१०&lt;/span&gt; दिसम्बर । छात्रो का एक समूह यूंजीसी के चेयर मैन सुखदेव थोराट से मिला और पूरे मामले से अवगत कराया। सुखदेव थोराट विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में सिरकटा कराने के लिए आए हैं। छात्रों ने काली पट्टी लगा कर भी अपना प्रतिरोध जताया। ऐसी स्थिति में जबकि छात्र विश्वविद्यालय में ब्रहामंवादी ताकतों के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठे हो विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी के द्वारा अनसुनी की जा रही आवाज प्रशासकों की क्रूरता और प्रशासकों की अमानवीयता को दर्शाता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-38592691662095553?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/38592691662095553/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_4028.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/38592691662095553'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/38592691662095553'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_4028.html' title='छात्रों का प्रतिरोध जारी'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9t_Px4vSI/AAAAAAAAABA/K1IOXrK986o/s72-c/100_4401.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-6212570417077135039</id><published>2009-12-09T00:05:00.000-08:00</published><updated>2009-12-09T00:14:48.469-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>छात्रों का प्रतिरोध जारी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;१० दिसम्बर. छात्रों को प्रशासन की तरफ से धमकाया जा रहा है. और पुलिस तैनात कर दी गयी. ताकि विश्वविद्यालय अपने आडंबर पूर्ण आयोजन को पूरा कर सके. इसके बरक्स ज्यादा से ज्यादा संख्या में छात्रों का समर्थन मिल रहा है. ब्रहमणवादी चरित्र के पूर्व कार्यकारी कुलपति आत्मप्रकाश श्रीवास्तव के बरखास्तगी की मांग जोरों पर है.&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; धरने की तस्वीरें&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413146508407369570" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cEb7Eb2I/AAAAAAAAAA4/j9Kltb8u1ms/s320/100_4401.JPG" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cD-iMX1I/AAAAAAAAAAw/Up4Frg1gSJc/s1600-h/100_4403.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413146500518403922" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cD-iMX1I/AAAAAAAAAAw/Up4Frg1gSJc/s320/100_4403.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cDbzIw6I/AAAAAAAAAAo/fh0lB1F3h-w/s1600-h/100_4394.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413146491194229666" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cDbzIw6I/AAAAAAAAAAo/fh0lB1F3h-w/s320/100_4394.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cDMPnV2I/AAAAAAAAAAg/rOsJlbLmucc/s1600-h/100_4391.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413146487018706786" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cDMPnV2I/AAAAAAAAAAg/rOsJlbLmucc/s320/100_4391.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cCgw2UDI/AAAAAAAAAAY/hhbm_mmmqIE/s1600-h/100_4387.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413146475346939954" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cCgw2UDI/AAAAAAAAAAY/hhbm_mmmqIE/s320/100_4387.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-6212570417077135039?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/6212570417077135039/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_09.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6212570417077135039'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/6212570417077135039'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post_09.html' title='छात्रों का प्रतिरोध जारी'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9cEb7Eb2I/AAAAAAAAAA4/j9Kltb8u1ms/s72-c/100_4401.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1263704930942613807.post-3640952130110015278</id><published>2009-12-08T23:55:00.000-08:00</published><updated>2009-12-09T00:03:42.665-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध'/><title type='text'>दीक्षांत समारोह का बहिष्कार करेंगे छात्र</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9ZsqJlX2I/AAAAAAAAAAM/VRPuUdq3kNE/s1600-h/100_4398.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413143900886228834" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_exEkLitixXE/Sx9ZsqJlX2I/AAAAAAAAAAM/VRPuUdq3kNE/s320/100_4398.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा। एक दलित छात्र के उत्पीडन और पीएचडी में उसका प्रवेश न लेने के ख़‍िलाफ़ छात्रों ने मंगलवार से आमरण अनशन शुरू कर दिया। छात्र बुधवार को आयोजित होनेवाले दीक्षांत समारोह का भी बहिष्कार करेंगे। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम का कहना है की अनुवाद विद्यापीठ में एमफिल के टॉपर रहे राहुल कांबले का जानबूझकर पीएचडी में दाखिला नहीं लिया जा रहा। राहुल का चयन सामान्य वर्ग में प्रतीक्षा सूची नंबर एक पर हुआ। एक चयनित छात्रा द्वारा प्रवेश न लेने से एक सीट खाली है, जिस पर नियम के अनुसार राहुल का नामांकन होना चाहिए। लेकिन केवल दलित छात्र होने कारण राहुल का नामांकन सामान्य वर्ग में नहीं किया जा रहा है, जबकि उसका चयन सामान्य वर्ग में हुआ है।&lt;br /&gt;छात्र राहुल कांबले का आरोप है की विद्यापीठ के डीन प्रो आत्मप्रकाश श्रीवास्तव पिछले दो महीने से उसका मानसिक और भावनात्मक शोषण कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के कुलपति ने भी इस मामले में कभी कोई गंभीरता नहीं दिखायी और राहुल को ही बार-बार प्रो श्रीवास्तव से माफी मांगने पर मजबूर किया और अंत में उसको एडमिशन देने से मना कर दिया। प्रो श्रीवास्तव ने कई बार राहुल पर जातिगत पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कमेंट किया। यही नहीं, उसके प्रोफेसर पिता पर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं।&lt;br /&gt;अंत में बार-बार ज्ञापन और अनुरोध-पत्र देने के बावजूद प्रशासन द्वारा इस मामले पर कोई रुचि न दिखाने से सबक लेते हुए विश्वविद्यालय के दलित छात्र-छात्राओं ने दीक्षांत समारोह का पूरी तरह बहिष्कार करने का निर्णय लिया हंै। इस मामले में छात्रों के हस्ताक्षरों की दो प्रतियां कुलपति को सौपी जा चुकी हैं। उसमें विश्वविद्यालय के गैर-दलित छात्रों ने भी अपना समर्थन जताते हुए हस्ताक्षर किए हैं। फोरम का स्पष्ट मानना है कि प्रो. श्रीवास्तव ने राहुल का जातिगत उत्पीड़न किया है। अतः उनके ख़‍िलाफ़ उचित कारवाई होनी चाहिए और राहुल कांबले का तत्काल पीएचडी में नामांकन होना चाहिए। फोरम ने इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के उपेक्षित रवैये की भी निंदा की है। फोरम की तरफ से दलित छात्र इस मामले को लेकर मंगलवार को दोहपर बाद से अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर बैठ गये हैं।&lt;br /&gt;छात्रों द्वारा कुलपति विभूति नारायण राय को दिया गया ज्ञापन&lt;br /&gt;प्रति,कुलपति,म गां अं हिं विवि, वर्धा&lt;br /&gt;विनम्र आग्रह है कि राहुल कांबले के मामले को लेकर फोरम माननीय महोदय से कई बार अनुरोध कर चुका है, लेकिन प्रशासन की तरफ से किसी भी तरह की सकारात्मक प्रतिक्रीया न आने के कारण हम आज दिनांक 08. 12. 2009, मंगलवार को विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय के निकट आमरण अनशन पर बैठने जा रहे है। हमारी दो मुख्य मांगें हैं -&lt;br /&gt;1. राहुल कांबले का तत्काल पीएचडी में नामांकन दिया जाए।2. राहुल कांबले को मानसिक एवं भावनात्मक उत्पीड़न देनेवाले प्रो आत्मप्रकाश श्रीवास्तव के ख़‍िलाफ़ कारवाई की जाए।&lt;br /&gt;इन दोनों मांगों के साथ हम कोई समझौता नहीं करने वाले हैं और न ही प्रशासन के दलित विरोधी रवैये के आगे झुकने वाले हैं। न्याय पाने तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा। इसके साथ ही हम दिनांक 09 दिसंबर 2009 को आयोजित होनेवाले दीक्षांत समारोह के बहिष्कार की भी घोषणा करते है।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;केंद्रीय समिति,अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1263704930942613807-3640952130110015278?l=mgahv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mgahv.blogspot.com/feeds/3640952130110015278/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/3640952130110015278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1263704930942613807/posts/default/3640952130110015278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mgahv.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='दीक्षांत समारोह का बहिष्कार करेंगे छात्र'/><author><name>mgahvreporter</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07310308861744390499</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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